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इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि निजी धन संबंधी विवादों में दबाव बनाने या बकाया रकम की वसूली के लिए आपराधिक न्याय प्रणाली का उपयोग नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने एक महिला की यौन शोषण के आरोप वाली शिकायत पर शुरू हुई पूरी आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर दिया। यह मामला प्लॉट की खरीद-बिक्री के विवाद से जुड़ा था, जिसमें महिला ने रुपए लौटाने का झांसा देकर यौन शोषण का आरोप लगाया था। न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी ने लखीमपुर खीरी की एक महिला की आपराधिक अपील पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। महिला ने विशेष न्यायाधीश, एससी-एसटी एक्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसकी शिकायत को एफआईआर के बजाय परिवाद के रूप में दर्ज करने का निर्देश दिया गया था। न्यायालय ने मामले के तथ्यों और शिकायत में लगाए गए आरोपों का परीक्षण किया। हाईकोर्ट ने पाया कि आरोप सामान्य मानवीय व्यवहार और स्वाभाविकता के अनुरूप नहीं थे। न्यायालय ने कहा कि उपलब्ध परिस्थितियों से प्रथमदृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि आपराधिक शिकायत का मुख्य उद्देश्य विपक्षियों पर दबाव बनाकर कथित बकाया धनराशि की वसूली करना था। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जब किसी आपराधिक शिकायत में न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग का स्पष्ट मामला सामने आता है, तो हाईकोर्ट संविधान के अनुच्छेद 226 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 (अब धारा 482 सीआरपीसी) के तहत अपनी अंतर्निहित शक्तियों का इस्तेमाल कर पूरी कार्यवाही निरस्त कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने यह भी दोहराया कि आपराधिक कानून को निजी विवादों के निपटारे या किसी पक्ष पर दबाव बनाने का माध्यम नहीं बनाया जा सकता।
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'पैसे वसूली के लिए आपराधिक कानून का इस्तेमाल नहीं':हाईकोर्ट ने यौन शोषण आरोप वाली शिकायत में पूरी कार्यवाही निरस्त