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इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने गन्ना किसानों को समय पर भुगतान न मिलने और देरी की अवधि का वैधानिक ब्याज न दिए जाने के मामले में राज्य सरकार और चीनी मिलों से तीखे सवाल किए हैं। न्यायालय ने कहा कि यदि कानून के तहत किसानों को भुगतान में देरी पर ब्याज मिलना है, तो उस ब्याज का भुगतान न किए जाने के लिए जिम्मेदार कौन है, इस पर भी विचार करना होगा। ‘चीनी मिलों के हित सुरक्षित रहें’ खंडपीठ ने यह भी सवाल उठाया कि कानून की व्याख्या और उसका क्रियान्वयन ऐसा क्यों हो कि केवल चीनी मिलों के हित सुरक्षित रहें, जबकि देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले गन्ना किसानों के हितों की अनदेखी हो। न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने मामले की अगली सुनवाई पर गन्ना आयुक्त को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का आदेश दिया है। मामले की सुनवाई अब तीन अगस्त को होगी। खंडपीठ किसान मजदूर संगठन के संयोजक वीएम सिंह की वर्ष 2006 से लंबित जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही है। याचिका में वर्ष 1996-97 के पेराई सत्र से अब तक गन्ना किसानों को भुगतान में हुई देरी पर कानून के अनुसार ब्याज दिलाने की मांग की गई है। याची की ओर से अधिवक्ता अमित कुमार सिंह भदौरिया ने कहा कि गन्ना किसानों को समय से भुगतान सुनिश्चित करना गन्ना आयुक्त का वैधानिक दायित्व है। कानून के अनुसार, गन्ना मूल्य का भुगतान 14 दिनों के भीतर किया जाना चाहिए, और देरी होने पर किसानों को 15 प्रतिशत वार्षिक की दर से ब्याज दिया जाना अनिवार्य है। यूपी शुगर मिल एसोसिएशन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जेएन माथुर ने दलील दी कि याचिका का दायरा वर्ष 1996 से वर्ष 2006 तक ही सीमित है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि वर्ष 1996 से अब तक की देरी पर ब्याज का भुगतान किया गया, तो यह राशि हजारों करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है, जिससे कई चीनी मिलों के सामने बंदी का संकट पैदा हो जाएगा।
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हाईकोर्ट ने गन्ना आयुक्त को किया तलब:पूछा- किसानों को ब्याज भुगतान न होने का जिम्मेदार कौन?