![]()
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक न्यायिक अधिकारी की वार्षिक गोपनीय आख्या (एसीआर) में दर्ज ‘संदिग्ध सत्यनिष्ठा’ संबंधी प्रतिकूल टिप्पणी को निरस्त कर दिया है।
कोर्ट ने कहा कि किसी न्यायिक अधिकारी के व्यवहार, कार्यशैली, प्रशासनिक निर्देशों का पालन न करने या न्यायिक आदेशों की गुणवत्ता से संबंधित आरोपों को सीधे उसकी ईमानदारी और सत्यनिष्ठा पर संदेह का आधार नहीं बनाया जा सकता। जानिये क्या है मामला न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति सत्यवीर सिंह की खंडपीठ ने स्मृति मंजू कुमारी की याचिका पर यह आदेश पारित किया। याची वर्ष 2019-20 के दौरान गाजियाबाद में अपर सिविल जज (सीनियर डिवीजन) के पद पर तैनात थीं। उनकी वार्षिक गोपनीय आख्या में सत्यनिष्ठा को ‘संदिग्ध’ बताया गया था।
एसीआर में कहा गया था कि अधिवक्ताओं की ओर से उनके काम और आचरण को लेकर कई मौखिक शिकायतें मिली थीं। इसके अलावा, उनके व्यवहार और कथित रूखेपन को लेकर बार के सदस्यों की शिकायतों का भी उल्लेख किया गया था। याची ने इन टिप्पणियों के खिलाफ कई अभ्यावेदन दिए, लेकिन राहत नहीं मिलने पर हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। कोर्ट ने कहा ठोस आधार क्या कोर्ट ने राज्य और हाईकोर्ट प्रशासन से यह स्पष्ट करने को कहा कि ‘संदिग्ध सत्यनिष्ठा’ जैसी गंभीर टिप्पणी के लिए ठोस तथ्य और न्यायिक आधार क्या है। प्रशासन की ओर से बताया गया कि संबंधित जिला जज ने अधिकारी की सत्यनिष्ठा प्रमाणित नहीं की थी और उन्हें खराब रेटिंग दी गई थी। अधिकारी के खिलाफ प्रशासनिक निर्देशों का पालन नहीं करने, कार्यप्रणाली और व्यवहार से संबंधित शिकायतों तथा कुछ प्रशासनिक घटनाओं का भी उल्लेख किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सत्यनिष्ठा का अर्थ मजबूत नैतिक सिद्धांत, ईमानदारी और भ्रष्ट प्रभावों से मुक्त चरित्र है। लापरवाही, असावधानी या अनजाने में हुई गलती अपने आप में ‘संदिग्ध सत्यनिष्ठा’ का आधार नहीं बन सकती। ईमानदारी पर सवाल का आधार नहीं हाईकोर्ट ने कहा कि उसके सामने रखे गए शिकायत पत्रों में ऐसा कोई आरोप नहीं मिला, जो सीधे तौर पर न्यायिक अधिकारी की ईमानदारी या नैतिक चरित्र पर सवाल उठाता हो। पीठ ने कहा कि संबंधित प्रतिकूल टिप्पणी मुख्य रूप से जिला जज की ओर से दी गई प्रतिक्रिया और निरीक्षण के दौरान मिली जानकारी पर आधारित थी। रिकॉर्ड से यह भी स्पष्ट नहीं था कि प्रतिकूल टिप्पणी दर्ज करने से पहले संबंधित उच्च अधिकारी ने न्यायिक अधिकारी से बातचीत कर उनका पक्ष जाना था। हाईकोर्ट ने एसीआर में दर्ज न्यायिक आदेशों से जुड़ी टिप्पणियों का भी परीक्षण किया। इन टिप्पणियों में अंतरिम आदेशों, निषेधाज्ञा और संपत्ति विवादों से संबंधित मामलों में न्यायिक अधिकारी द्वारा पारित आदेशों पर आपत्तियां थीं। पीठ ने कहा कि किसी न्यायिक आदेश की कानूनी या तथ्यात्मक त्रुटि का परीक्षण अपील या पुनरीक्षण में किया जा सकता है, लेकिन ऐसी त्रुटियों को न्यायिक अधिकारी की सत्यनिष्ठा से नहीं जोड़ा जा सकता। कोर्ट ने कहा कि संबंधित टिप्पणियां न्यायिक निर्णयों के गुण-दोष से जुड़ी थीं और उनका याचिकाकर्ता की ईमानदारी या सत्यनिष्ठा से कोई संबंध नहीं था। हाईकोर्ट ने न्यायिक अधिकारी के खिलाफ दर्ज ‘संदिग्ध सत्यनिष्ठा’ संबंधी प्रतिकूल टिप्पणी को निरस्त कर दिया। प्रतिकूल टिप्पणी हटाते हुए हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को उसके परिणामस्वरूप मिलने वाली राहत का हकदार माना और रिट याचिका का निस्तारण कर दिया।
Source link
न्यायिक अधिकारी की ‘संदिग्ध सत्यनिष्ठा’ की टिप्पणी रद्द:हाईकोर्ट ने कहा- ईमानदारी, सत्यनिष्ठा पर संदेह का आधार नहीं