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इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि अवमानना न्यायालय को मूल विवाद के गुण-दोष पर टिप्पणी करने का अधिकार नहीं है। न्यायालय ने अवमानना कोर्ट के उस आदेश के हिस्से को रद्द कर दिया, जिसमें एक कर्मचारी के नियमितीकरण के दावे की मेरिट पर टिप्पणी की गई थी। यह आदेश न्यायमूर्ति राजन राय और न्यायमूर्ति प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने राकेश कुमार मिश्रा की विशेष अपील पर सुनवाई के बाद पारित किया। अपीलकर्ता की ओर से अधिवक्ता आलोक मिश्रा ने न्यायालय को बताया कि अवमानना न्यायालय ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर नियमितीकरण के मुद्दे की मेरिट पर विचार किया। उनका तर्क था कि अवमानना न्यायालय का कार्य केवल यह देखना था कि रिट कोर्ट के आदेश का पालन हुआ है या नहीं। प्रतिवादी पक्ष ने न्यायालय को सूचित किया कि रिट कोर्ट के 17 सितंबर 2025 के आदेश के अनुसार, अपीलकर्ता को वेतनमान का न्यूनतम लाभ दिया जा चुका है। साथ ही, नियमितीकरण के दावे पर भी सुप्रीम कोर्ट के ‘धर्म सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ फैसले और संबंधित नियमों के आधार पर विचार किया गया है। न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि यदि अवमानना न्यायालय इस बात से संतुष्ट था कि आदेश के अनुपालन में विचार कर लिया गया है, तो उसे केवल कार्यवाही समाप्त करनी चाहिए थी। नियमितीकरण की पात्रता पर टिप्पणी करना उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर था। खंडपीठ ने 15 मई 2026 के उस भाग को पूरी तरह से निरस्त कर दिया, जिसमें नियमितीकरण के मुद्दे पर टिप्पणी की गई थी। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि अपीलकर्ता चाहे तो 24 अप्रैल 2026 के आदेश को सक्षम न्यायालय में चुनौती दे सकता है। न्यायालय ने यह भी कहा कि आदेश के इस भाग को हटाए जाने का यह अर्थ नहीं है कि रिट न्यायालय भविष्य में उन मुद्दों पर विचार नहीं कर सकेगा।
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लखनऊ हाईकोर्ट की टिप्पणी:अवमानना न्यायालय को मूल विवाद के गुण-दोष पर टिप्पणी करने का अधिकार नहीं