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इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने सरोगेसी से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि जिन दंपतीयों ने नया सरोगेसी कानून लागू होने से पहले आईवीएफ (IVF) प्रक्रिया शुरू कर दी थी और उनके भ्रूण (फ्रोजन एम्ब्रियो) पहले से सुरक्षित हैं, उनके मामले में केवल अधिक उम्र के आधार पर सरोगेसी की अनुमति नहीं रोकी जा सकती। न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति एके चौधरी की पीठ ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में प्रत्येक मामले के तथ्यों पर विचार कर निर्णय लिया जाना चाहिए। केवल आयु सीमा का हवाला देकर आवेदन खारिज करना उचित नहीं होगा। न्यायालय ने यह भी कहा कि संतान प्राप्त करने का अधिकार व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता और गरिमा से जुड़ा हुआ है। मामले में याचिकाकर्ता दंपती ने बताया कि उन्होंने वर्ष 2021 से पहले ही आईवीएफ उपचार शुरू कर दिया था। कई प्रयासों के बाद भी गर्भधारण नहीं हो सका, लेकिन उनके भ्रूण सुरक्षित रखे गए थे। बाद में डॉक्टरों ने स्वास्थ्य कारणों से उन्हें सरोगेसी की सलाह दी। इसी बीच, 25 जनवरी 2022 से नया सरोगेसी कानून लागू हो गया। इस कानून के अनुसार, पत्नी की अधिकतम आयु 50 वर्ष निर्धारित है। याचिकाकर्ता पत्नी की उम्र 50 वर्ष से कुछ अधिक होने के कारण उनके सरोगेसी आवेदन पर रोक लगा दी गई थी। न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि जब दंपती ने कानून लागू होने से पहले ही पूरी प्रक्रिया शुरू कर दी थी, तो बाद में बने कानून की आयु सीमा उनके मामले में सीधे तौर पर लागू नहीं की जा सकती। अदालत ने मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ), लखनऊ को निर्देश दिया कि वे दंपती के आवेदन पर नए सिरे से विचार करें और केवल उम्र को आधार बनाकर सरोगेसी की अनुमति देने से इनकार न करें। आवेदन पर कानून के अन्य प्रावधानों के अनुसार उचित निर्णय लिया जाए।
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फ्रोजन भ्रूण मामलों में उम्र सीमा बाधक नहीं : हाईकोर्ट:नए सरोगेसी कानून से पहले शुरू हुए मामलों में सीएमओ को निर्देश