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नई दिल्ली2 मिनट पहले
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वोटर्स लिस्ट के के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर रिपोर्ट पर विवाद के बीच चुनाव आयोग ने अपना पक्ष रखा है। आयोग ने X पर प्रेस रिलीज में कहा कि कई सदस्यों वाले संवैधानिक संस्था में अलग-अलग राय, सुझाव और टिप्पणियां आना सामान्य प्रक्रिया है।
आयोग ने कहा कि SIR समेत पिछले एक साल में लिए गए सभी अंतिम फैसले सभी सदस्यों की सर्वसम्मति से हुए हैं। वहीं, BJP ने भी कहा कि चुनाव आयुक्तों के बीच अलग-अलग राय और होना सच्चे लोकतंत्र की निशानी है।
दरअसल, इंडियन एक्सप्रेस ने बुधवार को अपनी रिपोर्ट में बताया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में आयोग के फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार आपत्ति जताई थी। इनमें फॉर्म-6 में बदलाव, वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने-हटाने और वोटर डेटा से मुद्दे शामिल थे।

14 आपत्तियों पर EC ने कहा- ये आंतरिक प्रक्रिया का हिस्सा
रिपोर्ट के मुताबिक, संधू और जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार कुछ फैसलों और आदेशों पर आपत्ति दर्ज की। इनमें चार आपत्तियां एक ही दिन दर्ज किए जाने की बात भी सामने आई है। दोनों आयुक्तों ने कथित तौर पर कुछ फैसले अपनी जानकारी या मंजूरी के बिना जारी होने पर सवाल उठाए थे।
EC ने कहा कि ड्राफ्ट स्तर पर आयोग के सदस्यों की ओर से उठाए गए सवाल, तकनीकी सुझाव और टिप्पणियां सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं। आयोग के मुताबिक, इनका उद्देश्य पारदर्शिता, कानूनी अनुपालन और चुनावी प्रक्रिया को बेहतर बनाना है।
Form-6 में बदलाव पर क्या था विवाद?
रिपोर्ट के मुताबिक, नए मतदाताओं के रजिस्ट्रेशन के लिए इस्तेमाल होने वाले Form-6 में SIR से जुड़ी जानकारी जोड़ी गई थी। दोनों चुनाव आयुक्तों ने इस बदलाव को लेकर आपत्ति जताई थी। रिपोर्ट में कहा गया कि विवेक जोशी ने नियमों में बदलाव किए बिना Form-6 बदलने पर सवाल उठाया था। बाद में सुखबीर सिंह संधू ने बदलाव को “अनधिकृत और गैरकानूनी” बताया था।
EC की प्रेस रिलीज में Form-6 का सीधे जिक्र नहीं किया गया। हालांकि आयोग ने कहा कि उसके सभी आधिकारिक आदेश और फैसले कानून और तय प्रक्रिया के तहत जारी किए गए हैं और अंतिम फैसले पूरी आयोग की सर्वसम्मत मंजूरी से लिए गए।
वोटर डेटा के केंद्रीकरण पर भी सवाल
रिपोर्ट के मुताबिक, संधू और जोशी ने चुनावी रोल के डेटाबेस तक पहुंच को लेकर भी चिंता जताई थी। उनका सवाल था कि क्या राज्यों के स्तर पर काम करने वाले अधिकारियों की पहुंच धीरे-धीरे दिल्ली में केंद्रीकृत की जा रही है।
EC ने इसके जवाब में कहा कि उसके ECINet जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म सख्त डेटा सिक्योरिटी प्रोटोकॉल के तहत काम करते हैं। अनधिकृत बदलाव और छेड़छाड़ रोकने के लिए IT सिक्योरिटी चेक और ऑडिट कंट्रोल लागू हैं। आयोग ने कहा कि ERO और DEO जैसे वैधानिक अधिकारी कानून के तहत मतदाताओं के नाम जोड़ने और हटाने का काम करते हैं।
वोटर जोड़ने-हटाने और पश्चिम बंगाल के मामलों पर भी आपत्ति
रिपोर्ट में कहा गया कि दोनों आयुक्तों की आपत्तियां वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने, हटाने और दोबारा जोड़ने की प्रक्रिया से भी जुड़ी थीं। पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान हटाए गए नामों से जुड़ी अपीलों को लेकर भी सवाल उठाए गए थे। संधू ने कथित तौर पर पूछा था कि इन अपीलों को दाखिल करने की मंजूरी किसने दी थी।
EC ने अपनी प्रेस रिलीज में इन मामलों का अलग-अलग जवाब नहीं दिया। आयोग ने सामान्य तौर पर कहा कि वोटर रजिस्ट्रेशन और नाम हटाने का काम ERO और DEO जैसे वैधानिक अधिकारी कानून के तहत करते हैं।
गोवा में 97 वोटरों का मामला
रिपोर्ट में गोवा का एक मामला भी सामने आया, जहां सत्यापित 97 पात्र मतदाताओं के नाम सॉफ्टवेयर से जुड़ी समस्या के कारण वोटर लिस्ट में नहीं जुड़ पाए थे। यह मामला वोटर डेटा के केंद्रीकरण से जुड़ी चिंताओं के उदाहरण के तौर पर बताया गया।
EC की प्रेस रिलीज में गोवा के इन 97 मतदाताओं के मामले पर अलग से कोई टिप्पणी नहीं की गई है।
EC बोला- 40 नई पहल और कई चुनावी सुधार किए
चुनाव आयोग ने कहा कि पिछले एक साल में उसने कई फैसले लिए, निर्देश जारी किए और करीब 40 नई पहल शुरू कीं। इनमें देशभर में मतदाता सूची के रिवीजन और SIR समेत कई चुनावी सुधार शामिल हैं।
आयोग ने कहा कि इन सभी फैसलों को पूरी आयोग की सर्वसम्मत मंजूरी मिली। EC ने यह भी कहा कि इस अवधि में बिहार, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी, असम और पश्चिम बंगाल में बड़े चुनाव और चुनाव से जुड़े कई काम कराए गए।
BJP बोली- अलग राय लोकतंत्र का हिस्सा
BJP प्रवक्ता संबित पात्रा ने चुनाव आयोग के भीतर अलग-अलग राय सामने आने को लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि अगर आयोग के सदस्य आपस में विचार-विमर्श और अपनी राय साझा नहीं करेंगे तो विपक्ष उन पर सरकार की हां में हां मिलाने का आरोप लगाएगा।
विपक्ष ने CEC को हटाने की मांग की
रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। कांग्रेस ने विवाद को ‘ज्ञानेशगेट’ नाम दिया। राहुल गांधी ने BJP, RSS और चुनाव आयोग पर ‘वोट चोरी’ का आरोप लगाया।
TMC प्रमुख ममता बनर्जी ने CEC को हटाने की मांग करते हुए SIR से पहले वाली वोटर लिस्ट के आधार पर पश्चिम बंगाल में दोबारा चुनाव कराने की मांग की। AAP नेता अरविंद केजरीवाल ने भी CEC की गिरफ्तारी की मांग की। ये सभी राजनीतिक दलों के आरोप और मांगें हैं।
कानून में क्या प्रावधान है?
CEC और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 18 के मुताबिक, आयोग का कामकाज जहां तक संभव हो, सर्वसम्मति से किया जाना चाहिए। अगर CEC और अन्य चुनाव आयुक्त किसी मुद्दे पर अलग राय रखते हैं, तो मामला बहुमत की राय के आधार पर तय किया जाता है।
