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इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ इस बात पर सुनवाई करेगी कि क्या पति-पत्नी के बीच चल रहे वैवाहिक विवाद के दौरान कार्यालय में हुई कथित अभद्रता पर कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से संरक्षण कानून के तहत कार्रवाई की जा सकती है। न्यायालय ने फिलहाल पति के खिलाफ शुरू की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है। यह आदेश न्यायमूर्ति पंकज भाटिया की एकल पीठ ने पति की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिका में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की शिकायतों की जांच के लिए गठित समिति की रिपोर्ट और उसके आधार पर जारी आरोपपत्र को चुनौती दी गई है। मामले में पति-पत्नी दोनों एक ही कार्यालय में कार्यरत हैं। मार्च 2023 में शादी के बाद उनके संबंध खराब हो गए। पत्नी ने आरोप लगाया कि 9 अक्टूबर 2024 को कार्यालय में पति और एक अन्य कर्मचारी ने उसकी मौजूदगी में अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया और अपमानजनक टिप्पणियां कीं। इस शिकायत पर कार्यालय की आंतरिक समिति ने जांच की। समिति ने पति के व्यवहार को कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न से संरक्षण, निषेध और निवारण अधिनियम, 2013 के दायरे में माना। इसके बाद पति के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू की गई। सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि पत्नी ने समिति के समक्ष दी गई शिकायत में अपने और आरोपी के बीच पति-पत्नी का संबंध होने का उल्लेख नहीं किया था। हालांकि, 28 दिसंबर 2024 को पति के खिलाफ दर्ज एफआईआर में दहेज मांगने, मारपीट और जातिसूचक गाली समेत कई आरोप लगाए गए। पति की ओर से कोर्ट में कहा गया कि पूरा विवाद वैवाहिक मतभेद से पैदा हुआ है, इसे यौन उत्पीड़न कानून के तहत कार्रवाई का आधार नहीं बनाया जा सकता। न्यायालय ने कहा कि प्रथम दृष्टया यह विचार करना जरूरी है कि जिस घटना की जड़ वैवाहिक विवाद में हो, उसे क्या यौन उत्पीड़न रोकथाम कानून के तहत लाया जा सकता है। न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि संबंधित कानून एक विशिष्ट उद्देश्य को ध्यान में रखकर बनाया गया है।
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पति-पत्नी के झगड़े का असर ऑफिस तक पहुंचा:यौन उत्पीड़न कानून के तहत कार्रवाई पर हाईकोर्ट ने उठाया सवाल