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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वाराणसी के एक बहुचर्चित नाबालिग लड़की से दुष्कर्म मामले में सुनाई गई उम्रकैद की सजा को घटाकर जेल में बिताई गई अवधि तक सीमित कर दिया है।
न्यायमूर्ति सलिल कुमार राय और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने सजा के खिलाफ अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए दोषी सुनील को भारतीय दंड संहिता की अन्य धाराओं में दी गई सजा से बरी कर दिया, लेकिन उसे पोक्सो एक्ट की धारा 7/9(एम )/9(एन)/10 (गंभीर लैंगिक उत्पीड़न, बिना प्रवेशन के) के तहत दोषी करार दिया। जानिये क्या है पूरा मामला 7 सितंबर 2017 को वाराणसी के रोहनिया थाना क्षेत्र में एक पांच वर्षीय बच्ची के पिता ने रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि आरोपी उसे छत पर ले गया और उसके साथ गलत हरकत की। बच्ची के अंतःवस्त्रों पर खून के धब्बे होने और उसके रोते हुए नीचे आने की बात सामने आई थी। विशेष सत्र न्यायालय ने 17 जून 2022 को आरोपी को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास और 50,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। आरोप साबित नहीं हो रहा हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन प्रवेशन (पेनिट्रेशन) का आरोप संदेह से परे साबित नहीं कर सका। अदालत ने कई विसंगतियों को रेखांकित किया: घटना के करीब 10-12 घंटे के भीतर हुई मेडिकल जांच में बच्ची के शरीर पर कोई बाहरी या आंतरिक चोट नहीं मिली और हाइमन भी सुरक्षित पाया गया। बच्ची के शुरुआती बयान (महिला उपनिरीक्षक के समक्ष) में रक्तस्राव का कोई उल्लेख नहीं था; यह बात केवल दो महीने बाद दर्ज धारा 164 सीआरपीसी के बयान में जोड़ी गई, जिसे अदालत ने विलंबित और सुधार-युक्त माना। अभियोजन ने बच्ची के कपड़ों की फॉरेंसिक रिपोर्ट अदालत में पेश नहीं की। आरोपी की मेडिकल जांच में भी कोई चोट नहीं पाई गई।परिवार द्वारा कथित रक्तस्राव के बावजूद तुरंत डॉक्टर के पास न ले जाना और पहले ग्राम प्रधान के पास जाना, अदालत को स्वाभाविक आचरण नहीं लगा। यौन आशय का आपराध साबित नहीं खंडपीठ ने यह भी कहा कि पोक्सो एक्ट की धारा 29 के तहत लगने वाली विधिक उपधारणा तभी लागू होती है जब अभियोजन पहले मूल तथ्य ठोस साक्ष्यों से साबित करे। ट्रायल कोर्ट ने बिना यह जांचे उपधारणा का यंत्रवत उपयोग किया। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पोक्सो एक्ट की यह उपधारणा आईपीसी की धाराओं (जैसे 376) पर लागू नहीं होती। हाईकोर्ट ने माना कि बच्ची को छत पर ले जाकर लिटाना और उसके गुप्तांग पर हाथ मारना/छूना, यौन आशय से किया गया कृत्य साबित होता है, भले ही प्रवेशन साबित न हो सका हो। इस आधार पर आरोपी को पोक्सो एक्ट की धारा 10 के तहत दोषी ठहराया गया, जिसमें न्यूनतम पांच और अधिकतम सात वर्ष कारावास का प्रावधान है। चूंकि आरोपी पहले ही पांच वर्ष आठ माह जेल में बिता चुका है, अदालत ने उसे उतनी ही सजा (काटी गई अवधि) सुनाई और 50,000 रुपये का जुर्माना बरकरार रखा। आरोपी को तत्काल जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया गया है।
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नाबालिग से दुष्कर्म के आरोपी की उम्रकैद की सजा घटाई:हाईकोर्ट ने अब तक काटी गई सजा तक किया सीमित, वाराणसी का मामला