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इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने मिशन वात्सल्य योजना के तहत संचालित किशोर गृहों को समय पर धनराशि न मिलने पर केंद्र और राज्य सरकार को फटकार लगाई है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सरकारी प्रक्रियाएं बच्चों के भोजन, इलाज और देखभाल से अधिक महत्वपूर्ण नहीं हो सकतीं। यह आदेश न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह की खंडपीठ ने अनूप गुप्ता की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया। सुनवाई के दौरान न्यायालय को बताया गया कि नया वित्तीय वर्ष शुरू हुए लगभग दो महीने हो चुके हैं, लेकिन एनजीओ आधारित किशोर गृहों को अभी तक कोई धनराशि प्राप्त नहीं हुई है। कुछ किशोर गृहों में 200 से अधिक बच्चे रह रहे हैं और उनका मासिक खर्च लगभग 80 लाख रुपये है। अप्रैल से अब तक इन गृहों को कोई फंड जारी नहीं किया गया है। राज्य सरकार ने अपनी ओर से बताया कि नई ऑनलाइन व्यवस्था और कुछ तकनीकी दिक्कतों के कारण फंड जारी करने में देरी हो रही है। महिला कल्याण विभाग की सचिव मनीषा त्रिघाटिया ने न्यायालय को सूचित किया कि सरकार निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार ही कार्य कर सकती है। इस पर हाईकोर्ट ने नाराजगी व्यक्त करते हुए इस रवैये को असंवेदनशील बताया। न्यायालय ने सवाल किया कि यदि तीन महीने तक पैसा नहीं मिलेगा, तो बच्चों के खाने, इलाज और अन्य जरूरतों का खर्च कौन उठाएगा। न्यायालय ने केंद्र और राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वे 29 मई तक मिलकर एक ऐसा प्रस्ताव प्रस्तुत करें, जिससे प्रदेश के सातों एनजीओ संचालित किशोर गृहों को तुरंत अंतरिम धनराशि उपलब्ध कराई जा सके। साथ ही, राज्य सरकार को अगली सुनवाई पर यह भी बताने का निर्देश दिया गया है कि चालू वित्तीय वर्ष में इन किशोर गृहों के लिए कुल कितनी धनराशि जारी की जानी है।
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बच्चों के हक से बड़ी नहीं सरकारी प्रक्रिया:किशोर गृहों को पैसा न मिलने पर सरकार से जवाब तलब