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इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने मुकदमों की सुनवाई टालने और बिना उचित कारण अदालत से अनुपस्थित रहने की प्रवृत्ति पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। न्यायालय ने कहा कि यह वकालत के पेशे की गरिमा के अनुरूप नहीं है। न्यायालय ने टिप्पणी की कि कुछ मामलों में जानबूझकर सुनवाई को आगे बढ़ाने का प्रयास किया जाता है। इससे लंबित मुकदमों का बोझ वास्तविक कारणों के बजाय कृत्रिम रूप से बढ़ता है, जिससे न्याय प्रदान करने की प्रक्रिया प्रभावित होती है। श्रावस्ती के मामले में हो रही थी सुनवाई यह महत्वपूर्ण टिप्पणी न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की एकल पीठ ने श्रावस्ती के एससी-एसटी एक्ट से जुड़े एक आपराधिक मामले में फैसला सुनाते हुए की। न्यायालय ने विशेष न्यायाधीश, एससी-एसटी एक्ट, श्रावस्ती के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें सीआरपीसी की धारा 319 के तहत एक व्यक्ति को अतिरिक्त आरोपी के रूप में तलब करने की मांग खारिज कर दी गई थी। मामले में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि धारा 319 सीआरपीसी के तहत किसी व्यक्ति को अतिरिक्त आरोपी के रूप में तलब करने के लिए केवल प्रथम दृष्टया साक्ष्य पर्याप्त नहीं है। इसके लिए रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्य इतने मजबूत होने चाहिए कि आरोपी के खिलाफ कार्रवाई का ठोस आधार बन सके। बार-बार तारीख मांगने पर चिंता जताई न्यायालय ने पाया कि वर्तमान मामले में ऐसा कोई सशक्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं था, जिसके आधार पर संबंधित व्यक्ति को अतिरिक्त आरोपी के रूप में तलब किया जा सके। लिहाजा, हाईकोर्ट ने विशेष न्यायाधीश के पारित आदेश को कानून सम्मत बताते हुए उसमें हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। फैसले के दौरान न्यायालय ने न्यायिक प्रक्रिया में अनावश्यक देरी पर भी चिंता जताई। पीठ ने दोहराया कि मुकदमों की सुनवाई टालने के लिए बार-बार तारीख मांगने या बिना उचित कारण अदालत से अनुपस्थित रहने की प्रवृत्ति से न्यायालय पर लंबित मुकदमों का बोझ बढ़ता है। ऐसी प्रवृत्ति न केवल न्याय वितरण की गति को प्रभावित करती है, बल्कि वकालत के पेशे की गरिमा पर भी प्रतिकूल असर डालती है।
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हाईकोर्ट- अनावश्यक सुनवाई टालने से बढ़ता है अदालती बोझ:बिना उचित कारण अनुपस्थित रहना वकालत की गरिमा के अनुरूप नहीं