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इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण आदेश में कहा है कि किसी मुकदमे में गंभीर और गैर-जमानती धाराएं जोड़ने की प्रक्रिया शुरू होने मात्र से आरोपी को आत्मसमर्पण कर नई जमानत लेने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जब तक अदालत नई धाराओं को औपचारिक रूप से आरोप के रूप में शामिल नहीं कर लेती, तब तक पहले से मिली जमानत जारी रहेगी। पॉक्सो मामले में दाखिल याचिका पर आदेश यह आदेश न्यायमूर्ति श्री प्रकाश सिंह ने गोंडा के एक पॉक्सो मामले में दाखिल याचिका पर दिया। इस मामले में वर्ष 2020 में दर्ज एफआईआर में शुरुआत में केवल छेड़छाड़ और धमकी देने के आरोप थे। बाद में पीड़िता के बयान के आधार पर पुलिस ने सामूहिक दुष्कर्म और पॉक्सो कानून की गंभीर धाराएं जोड़ने का अनुरोध किया। इस पर ट्रायल कोर्ट ने आरोपों में बदलाव की कार्यवाही शुरू करते हुए आरोपी को अदालत में उपस्थित होकर नई जमानत लेने का निर्देश दिया था। आरोपी पक्ष ने हाईकोर्ट में दी थी आदेश को चुनौती आरोपी पक्ष ने हाईकोर्ट में इस आदेश को चुनौती दी। उन्होंने दलील दी कि अभी नई धाराएं केवल प्रस्तावित हैं और उन्हें अदालत ने अंतिम रूप से आरोप के तौर पर स्वीकार नहीं किया है। इसलिए नई जमानत लेने का आदेश गलत है। हाईकोर्ट ने आरोपी की इस दलील को स्वीकार कर लिया। न्यायालय ने कहा कि ट्रायल कोर्ट को आरोप बदलने का अधिकार है, लेकिन जब तक नई धाराएं आधिकारिक रूप से आरोप का हिस्सा नहीं बन जातीं, तब तक आरोपी को आत्मसमर्पण या नई जमानत के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। न्यायालय की इस टिप्पणी से याचियों को राहत मिली है। इस आदेश से यह स्पष्ट हो गया है कि केवल गंभीर धाराएं जोड़ने की मांग होने भर से पहले से मिली जमानत स्वतः समाप्त नहीं हो जाती है।
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लखनऊ खंडपीठ का आदेश, जमानत जारी रहेगी:आरोप औपचारिक रूप से शामिल हुए बिना नई जमानत अनिवार्य नहीं