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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फिर कहा कि जो आरोपी अदालत की कार्यवाही और जांच से जानबूझकर बचता है तथा फरार घोषित हो चुका हो, उसे सामान्यतः अग्रिम जमानत जैसी असाधारण राहत नहीं दी जा सकती।
जस्टिस विवेक कुमार सिंह की पीठ ने आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोपी एक व्यक्ति की अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि बिना किसी वैध या संतोषजनक कारण के अदालत की प्रक्रिया से बचने वाले और फरार घोषित किए गए आरोपी को अग्रिम जमानत देने का सामान्य नियम नहीं है। जानिये क्या है मामला मामले में दर्ज एफआईआर में आरोप है कि आरोपी माशू उर्फ अमन जोशी के खिलाफ थाना – छाता, जिला – आगरा में मुकदमा दर्ज है। आरोप है कि उसने विवाह का झांसा देकर पीड़िता से शारीरिक संबंध बनाए, जबकि वह पहले से विवाहित था। जब पीड़िता को उसकी शादीशुदा होने की जानकारी मिली और उसने विवाह के लिए दबाव बनाया, तो आरोपी ने शादी से इनकार कर दिया और कथित रूप से उसे धमकाया। लगातार मानसिक प्रताड़ना से परेशान होकर पीड़िता ने 31 जनवरी 2026 को आत्महत्या कर ली। आरोपी ने हाईकोर्ट में दलील दी कि उसने पीड़िता को आत्महत्या के लिए न तो उकसाया और न ही उसकी कोई ऐसी मंशा थी जिससे आत्महत्या का अपराध बनता हो। आत्मसमर्पण को बोला गया था राज्य सरकार और शिकायतकर्ता की ओर से बताया गया कि आरोपी पहले एफआईआर रद्द कराने हाईकोर्ट आया था, जहां उसे आत्मसमर्पण कर नियमित जमानत लेने को कहा गया था। लेकिन उसने अदालत के आदेश का पालन नहीं किया, जिसके बाद उसके खिलाफ धारा 82 सीआरपीसी के तहत उद्घोषणा की कार्रवाई शुरू हुई। बाद में उसने जांच में सहयोग का आश्वासन देकर वह कार्रवाई निरस्त कराई, लेकिन इसके बावजूद वह फिर जांच से बचता रहा और दोबारा उद्घोषणा की कार्रवाई शुरू करनी पड़ी। जानबूझकर एजेंसियों से दूर रहा इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपी ने स्वयं दिए गए आश्वासन का भी पालन नहीं किया और जानबूझकर जांच एजेंसी की पहुंच से बाहर रहा। सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि फरार या उद्घोषित अपराधी सामान्यतः अग्रिम जमानत का हकदार नहीं होता। इन्हीं कारणों से अदालत ने माना कि यह मामला अग्रिम जमानत देने योग्य दुर्लभ और असाधारण श्रेणी का नहीं है और आरोपी की याचिका को खारिज कर दिया।
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फरार घोषित आरोपी को जमानत नहीं मिल सकती:आगरा का मामला, कोर्ट ने कहा सामान्यता ऐसे केस में राहत नहीं