पुलिस का काम अपराधों की जांच करना, शादियों की नहीं:हाईकोर्ट ने महिला की पसंद से हुई शादी में दर्ज एफआईआर रद्द किया


इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि दो बालिग व्यक्तियों द्वारा अपनी इच्छा से किया गया विवाह कोई अपराध नहीं है। कोर्ट ने कहा ऐसे मामलों में पुलिस को अनावश्यक हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है।
कोर्ट ने भदोही जिले के सुरियावां थाने में दर्ज अपहरण से संबंधित एफआईआर को रद्द करते हुए पुलिस की कार्रवाई को व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन बताया। पति-पत्नी ने दाखिल की याचिका मामले में महिला और उसके पति ने याचिका दाखिल कर बताया कि दोनों बालिग हैं, प्रेम संबंध में थे और 18 फरवरी 2026 को प्रयागराज में आर्य वैदिक सभा में विवाह किया। विवाह की जानकारी मिलने पर परिजनों ने विरोध किया और जान से मारने की धमकी दी, जिसके बाद उन्होंने अपनी सुरक्षा की गुहार लगाई। सुनवाई के दौरान महिला स्वयं हाईकोर्ट में उपस्थित हुई और स्पष्ट कहा कि उसने अपनी इच्छा से विवाह किया है तथा वह अपने पति के साथ ही रहना चाहती है। अदालत ने माना कि जब एक बालिग महिला अपनी स्वतंत्र इच्छा से जीवनसाथी चुन रही है तो इस मामले में किसी प्रकार के प्रलोभन या अपहरण का प्रश्न नहीं उठता। यह कानून की प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल खंडपीठ ने पुलिस के रवैये पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि पुलिस का काम अपराधों की जांच करना है, विवाहों की नहीं। अदालत ने कहा कि बालिग व्यक्ति को अपनी पसंद से विवाह करने की स्वतंत्रता संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित मौलिक अधिकार है और इस तरह की जांच कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है। कोर्ट ने एफआईआर रद्द करते हुए भदोही के पुलिस अधीक्षक और सुरियावां थाना प्रभारी पर संयुक्त रूप से एक हजार रुपये तथा महिला के पिता पर पांच हजार रुपये का जुर्माना लगाया। साथ ही निर्देश दिया कि यह राशि महिला को अदा की जाए और संबंधित केस की कार्यवाही समाप्त मानते हुए आवश्यक प्रविष्टि पुलिस अभिलेखों में की जाए।

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