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इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि 1 जनवरी 2014 से पुराने भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 के निरस्त होने के बाद उसके तहत शुरू की गई अधिग्रहण प्रक्रिया कानूनी रूप से मान्य नहीं मानी जा सकती। न्यायालय ने ऐसी कार्रवाई को प्रारंभ से ही शून्य बताया है। खंडपीठ ने लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) को निर्देश दिया कि याची को 2014 से पहले की दरों पर नहीं, बल्कि नए भूमि अधिग्रहण कानून के तहत वर्तमान बाजार मूल्य के आधार पर मुआवजा निर्धारित कर तीन माह के भीतर भुगतान किया जाए। यह आदेश न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने लोहिया डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड की याचिका पर पारित किया। याचिका में बताया गया था कि सरोजनीनगर तहसील के अहमामऊ गांव स्थित 0.5020 हेक्टेयर भूमि के अधिग्रहण के लिए धारा-4 की अधिसूचना पर 27 दिसंबर 2013 की तारीख अंकित थी। हालांकि, इसका राजपत्र में प्रकाशन 4 जनवरी 2014 को हुआ। इसके बाद की सभी वैधानिक औपचारिकताएं भी 1 जनवरी 2014 के बाद पूरी हुईं। खंडपीठ ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए कहा कि केवल अधिसूचना पर दर्ज तारीख के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हो गई थी। कानून के अनुसार, अधिग्रहण तभी प्रारंभ माना जाएगा, जब धारा-4 की अधिसूचना का विधिवत राजपत्र, समाचार पत्रों और स्थानीय स्तर पर प्रकाशन हो। चूंकि ये सभी औपचारिकताएं 1 जनवरी 2014 के बाद पूरी हुईं, इसलिए निरस्त हो चुके 1894 के अधिनियम के तहत की गई कार्रवाई वैध नहीं है। हालांकि, न्यायालय ने यह भी माना कि संबंधित भूमि का अधिग्रहण 45 मीटर चौड़ी सार्वजनिक सड़क के निर्माण जैसे महत्वपूर्ण जनहित के उद्देश्य से किया गया था। ऐसे में अधिग्रहण को रद्द करने के बजाय, अदालत ने एलडीए को निर्देश दिया कि वह नए भूमि अधिग्रहण कानून के प्रावधानों के अनुसार वर्तमान बाजार दरों पर मुआवजा तय कर तीन माह के भीतर उसका भुगतान सुनिश्चित करे।
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पुराने भूमि अधिग्रहण कानून के तहत कार्रवाई अवैध:हाईकोर्ट ने LDA को नए कानून से मुआवजा देने का दिया निर्देश