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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि भरण-पोषण तय करने के मामलों में अदालतों को तकनीकी आधार पर नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और आश्रितों की गरिमापूर्ण जीवन-यापन की जरूरतों को ध्यान में रखकर निर्णय देना चाहिए।
न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की एकल पीठ ने बुलंदशहर फैमिली कोर्ट के आदेश को आंशिक रूप से निरस्त करते हुए पत्नी और दो नाबालिग बच्चों के भरण-पोषण की राशि बढ़ा दी। मामले में फैमिली कोर्ट ने पत्नी को भरण-पोषण देने से इनकार कर दिया था और दोनों बच्चों को केवल 3-3 हजार रुपये प्रतिमाह देने का आदेश दिया था। इस आदेश को चुनौती देते हुए पत्नी और बच्चों ने हाईकोर्ट में आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दाखिल की थी। जानिये क्या है मामला हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 125 सीआरपीसी की कार्यवाही का उद्देश्य परित्यक्त पत्नी और आश्रित बच्चों को आर्थिक सुरक्षा देना है। ऐसे मामलों में अदालत को वैवाहिक विवादों की विस्तृत सुनवाई की तरह कठोर साक्ष्यों की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। यदि पति ने भरण-पोषण देना बंद कर दिया है और पति-पत्नी के बीच गंभीर वैवाहिक विवाद है, तो यह पत्नी के अलग रहने का उचित आधार माना जा सकता है। अदालत ने यह भी माना कि पति, जो सेना से सेवानिवृत्त है और पेंशन प्राप्त करता है, अपनी पत्नी और दो स्कूली बच्चों के भरण-पोषण से बच नहीं सकता। बच्चों को 3-3 हजार रुपये प्रतिमाह देना वर्तमान परिस्थितियों में अपर्याप्त और अव्यावहारिक है। फैमिली कोर्ट का आदेश संशोधित हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश संशोधित करते हुए पत्नी के लिए 5 हजार रुपये प्रतिमाह तथा दोनों नाबालिग बच्चों के लिए 4-4 हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण निर्धारित किया। कुल 13 हजार रुपये प्रतिमाह की यह राशि आवेदन दायर होने की तारीख 2 फरवरी 2021 से देय होगी। साथ ही, बकाया राशि 12 समान मासिक किस्तों में चुकाने का निर्देश दिया गया है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि भुगतान में चूक होने पर पेंशन सहित अन्य वैध देयों से वसूली की जा सकेगी।
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पत्नी और बच्चों का हाईकोर्ट ने बढ़ाया गुजारा भत्ता:हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश संशोधित किया, कहा-जरूरत पर ध्यान दें