पंजाबी लिपि की उत्पत्ति पर संगोष्ठी:उत्तर प्रदेश पंजाबी अकादमी ने गुरुमुखी के ऐतिहासिक विकास पर विचार रखे


उत्तर प्रदेश पंजाबी अकादमी के सहयोग से सोमवार को अशोक मार्ग स्थित इंदिरा भवन के अकादमी कार्यालय परिसर में एक महत्वपूर्ण संगोष्ठी का आयोजन किया गया। यह संगोष्ठी पंजाबी भाषा और उसकी समृद्ध लिपि पर केंद्रित थी, जिसमें ‘पंजाबी लिपि की उत्पत्ति’ विषय पर विस्तार से चर्चा की गई। कार्यक्रम में विद्वानों ने गुरुमुखी लिपि के ऐतिहासिक विकास, सांस्कृतिक महत्व और आधुनिक समय में उसकी उपयोगिता पर अपने विचार प्रस्तुत किए। संगोष्ठी में वरिष्ठ पंजाबी चिंतक सत्येंद्र पाल सिंह ने बताया कि पंजाबी भाषा के विकास के साथ उसकी लिपि का भी क्रमिक विकास हुआ। उन्होंने उल्लेख किया कि प्राचीन भारत की ब्राह्मी लिपि से कई क्षेत्रीय लिपियां विकसित हुईं, जिनमें से एक धारा से गुरुमुखी लिपि का विकास माना जाता है। पंजाब क्षेत्र में शारदा, टाकरी और लांडा जैसी लिपियां भी प्रचलित थीं, जिन्होंने पंजाबी लेखन परंपरा को समृद्ध बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गुरुमुखी आज पंजाबी भाषा की सबसे अधिक प्रचलित वरिष्ठ लेखक एवं चिंतक नरेंद्र सिंह ने गुरुमुखी लिपि के विकास की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि गुरु अंगद देव जी ने पूर्व प्रचलित लिपियों को एक व्यवस्थित स्वरूप प्रदान किया। उस समय धार्मिक ग्रंथों के लेखन में सिद्धमात्रिका लिपि का व्यापक उपयोग होता था, लेकिन गुरु अंगद देव ने गुरुमुखी वर्णमाला को वैज्ञानिक ढंग से व्यवस्थित कर उसे एक नई पहचान दी। यही कारण है कि गुरुमुखी आज पंजाबी भाषा की सबसे अधिक प्रचलित और मान्य लिपि है। साहित्यिक कृतियों का संरक्षण गुरुमुखी लिपि का माध्यम नवयुग कन्या महाविद्यालय की दर्शनशास्त्र विभागाध्यक्ष मेजर डॉ. मनमीत कौर सोढ़ी ने अपने संबोधन में कहा कि किसी भी भाषा की लिपि केवल लेखन का माध्यम नहीं होती, बल्कि वह समाज की संस्कृति, इतिहास और परंपराओं की संरक्षिका भी होती है। उन्होंने बताया कि गुरु ग्रंथ साहिब सहित अनेक धार्मिक और साहित्यिक कृतियों का संरक्षण गुरुमुखी लिपि के माध्यम से ही संभव हो पाया है।

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