डिप्टी एसपी अमरेश बघेल की बर्खास्तगी रद्द:हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की याचिका खारिज की, जांच रिपोर्ट को कदाचार नहीं माना


इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने डिप्टी एसपी अमरेश कुमार सिंह बघेल को बड़ी राहत देते हुए राज्य लोक सेवा अधिकरण के उस आदेश को बरकरार रखा है, जिसमें उनकी बर्खास्तगी रद्द की गई थी। इसके साथ ही न्यायालय ने राज्य सरकार की ओर से दाखिल चुनौती याचिका भी खारिज कर दी। हालांकि, खंडपीठ ने अधिकरण के उस हिस्से को निरस्त कर दिया, जिसमें विभाग को आरोप पत्र के चरण से दोबारा विभागीय जांच शुरू करने का निर्देश दिया गया था। अदालत ने कहा कि जब रिकॉर्ड पर प्रथम दृष्टया किसी कदाचार का आधार ही नहीं बनता, तो दोबारा विभागीय जांच का कोई औचित्य नहीं है। सरकार की याचिका खारिज यह आदेश न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने सुनाया। राज्य सरकार ने 11 सितंबर 2025 को राज्य लोक सेवा अधिकरण के आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें अमरेश बघेल की बर्खास्तगी रद्द कर दी गई थी। 2019 के वाराणसी केस से जुड़ा मामला पूरा मामला वर्ष 2019 में वाराणसी के लंका थाने में पूर्व सांसद अतुल राय के खिलाफ दर्ज मुकदमे से जुड़ा है। आरोप पत्र दाखिल होने के बाद आरोपी के पिता की शिकायत पर तत्कालीन एडीजी, वाराणसी ने जांच के आदेश दिए थे। उस समय सीओ भेलूपुर के पद पर तैनात अमरेश बघेल ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आगे विवेचना कराने की संस्तुति करते हुए अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। बाद में इसी रिपोर्ट के आधार पर उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू की गई। उन्हें निलंबित किया गया और अंततः सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। ‘अलग राय होना कदाचार नहीं’ हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि किसी अधिकारी को वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश पर निष्पक्ष जांच कर अपनी राय देने का दायित्व सौंपा जाता है। यदि वरिष्ठ अधिकारी उस राय से सहमत नहीं हैं तो वे उसे अस्वीकार कर सकते हैं, लेकिन केवल अलग राय होने के कारण जांच अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकती। रिपोर्ट केवल वरिष्ठ अधिकारियों के विचारार्थ थी खंडपीठ ने कहा कि बघेल द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट केवल वरिष्ठ अधिकारियों के विचार के लिए थी। यह न तो न्यायालय में दाखिल की गई थी और न ही बाध्यकारी थी। इसलिए इसे कदाचार का आधार नहीं बनाया जा सकता। एसपी (सिटी) ने भी जताई थी सहमति अदालत ने यह भी गौर किया कि तत्कालीन एसपी (सिटी) ने भी सीओ की रिपोर्ट से सहमति जताते हुए आगे विवेचना की संस्तुति की थी। ऐसे में केवल अधीनस्थ अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई करना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता। दुर्भावना या दबाव का कोई साक्ष्य नहीं हाईकोर्ट ने माना कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है, जिससे यह साबित हो कि अमरेश बघेल ने किसी दबाव, प्रभाव या दुर्भावना में रिपोर्ट तैयार की थी। इसलिए उनके खिलाफ की गई विभागीय कार्रवाई कानून की कसौटी पर टिक नहीं सकती।

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