जीवनसाथी चुनने का मौलिक अधिकार, पिता रोक नहीं सकते:हाईकोर्ट ने कहा सुरक्षा दें, बदायूं के मामले में पिता की हिरासत में लौटने से इंकार


इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बदायूं जिले के एक मामले में बालिग युवती को अपनी मर्जी से पति के साथ रहने की छूट दे दी। हैबियस कॉर्पस याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति संदीप जैन ने यह फैसला सुनाया। मोहित नामक युवक ने कोर्ट में याचिका दाखिल कर कहा था कि उसने स्मृति (मोनी) से 18 जुलाई 2026 को विवाह किया है, लेकिन पुलिस ने उसे उसके पिता संजीव की हिरासत में रखा हुआ है। कोर्ट के आदेश पर 31 अगस्त 2026 को पुलिस ने मोनी को कोर्ट में पेश किया। कोर्ट में क्या हुआ जज ने मोनी से व्यक्तिगत रूप से बातचीत की। उसने बताया कि उसकी जन्मतिथि 8 जून 2008 है, यानी वह बालिग है। उसने दसवीं तक पढ़ाई की है और अपनी मर्जी से मोहित से शादी की। उसने साफ कहा कि यह फैसला बिना किसी दबाव या जबरदस्ती के लिया गया है और वह अपने पति के साथ ससुराल में रहना चाहती है। मोहित ने भी विवाह की पुष्टि की। मोनी के पिता संजीव ने भले ही बेटी के फैसले से नाराजगी जताई, पर उन्होंने भी माना कि बेटी बालिग हो चुकी है। कोर्ट का फैसला
कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवनसाथी चुनने का अधिकार व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा का अभिन्न हिस्सा है। बालिग होने के बाद माता-पिता या रिश्तेदार किसी की पसंद को नहीं बदल सकते, भले ही उन्हें यह फैसला नापसंद हो। कोर्ट ने मोनी को अपनी मर्जी से मोहित के साथ रहने की इजाजत दी और आदेश दिया कि कोई भी उसे धमकी, दबाव या परेशान न करे। पुलिस को दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और उन्हें कोर्ट परिसर से सुरक्षित उनकी मंजिल तक पहुंचाने के निर्देश भी दिए गए। याचिका मंजूर कर ली गई।

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