इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने कुमार मनीष की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज कर दी।
मनीष को जी एस टी इंटेलिजेंस महानिदेशालय गाजियाबाद यूनिट ने 17 अप्रैल 2026 को धारा 132 के तहत गिरफ्तार किया था। गिरफ्तारी अवैध बताई याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि उसकी गिरफ्तारी अवैध थी । गिरफ्तारी मेमो में समय की गड़बड़ी, गिरफ्तारी के आधार समय पर न देना, और पत्नी को दस्तावेज गिरफ्तारी के बाद सौंपे जाने जैसी खामियां बताई गईं। विभाग की ओर से बताया गया कि मनीष पेमेंट गेटवे के जरिए ऑनलाइन गेमिंग कंपनियों की फर्जी/डमी 47 फर्मों के जरिए लगभग ₹1,644 करोड़ की राशि रूट कराने और इस पर पूरा 28% जी एस टी न देकर सिर्फ 18% कमीशन-आधारित टैक्स चुकाने में मास्टरमाइंड था। जांच में रूपये 460 करोड़ से अधिक की टैक्स चोरी सामने आई, जबकि इन फर्मों ने मात्र रूपये 15.4 करोड़ टैक्स जमा किया था। जांच एजेंसी के अनुसार फंड लेयरिंग कर अंततः मनीष के निजी बैंक खाते तक पहुंचाया गया। मजिस्ट्रेट का रिमांड आदेश अवैध नहीं कोर्ट ने पाया कि गिरफ्तारी के 18 विस्तृत आधार दर्ज किए गए थे और यह सीबीआईसी के 17 अगस्त 2022 के सर्कुलर के अनुरूप था। कोर्ट ने सतेंदर कुमार अंतिल मामले के हवाले से कहा कि गिरफ्तारी के लिए लिखित कारण दर्ज होना ज़रूरी है, जो इस मामले में पूरा हुआ। अदालत ने कहा कि सक्षम मजिस्ट्रेट द्वारा दिया गया रिमांड आदेश अवैध नहीं कहा जा सकता। नतीजतन, कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए मनीष की रिहाई की मांग ठुकरा दी।
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जीएसटी चोरी में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज:हाईकोर्ट ने कहा मजिस्ट्रेट का रिमांग अवैध नहीं, रिहाई की मांग रद्द