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इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने सुलतानपुर के राजकीय स्वायत्त मेडिकल कॉलेज में जन्मे एक नवजात की मौत के मामले में सख्त रुख अपनाया है। नवजात को इलाज के लिए एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल भेजा गया था, लेकिन उसे इलाज नहीं मिल पाया और उसकी मौत हो गई। कोर्ट ने सरकार से पूछा है कि करीब तीन साल पहले शुरू हुए इस मेडिकल कॉलेज में इमरजेंसी से निपटने के लिए वेंटिलेटर और बाल शल्य चिकित्सक तक नहीं हैं, तो वहां गंभीर मरीजों का इलाज कैसे होगा। सुनवाई के दौरान कोर्ट को बताया गया कि नवजात को जन्मजात बीमारियों के कारण वेंटिलेटर और विशेषज्ञ इलाज की जरूरत थी। हालांकि, सुलतानपुर मेडिकल कॉलेज में ये दोनों सुविधाएं नहीं थीं। इसके बाद बच्चे को बेहतर इलाज के लिए केजीएमयू रेफर किया गया। वहां ऑक्सीजन सुविधा वाले बेड खाली नहीं थे। फिर उसे लोहिया संस्थान और एसजीपीजीआई भेजा गया, लेकिन वहां भी बेड नहीं मिल पाया। इलाज न मिलने के कारण नवजात की मौत हो गई। सरकारी अस्पतालों में सुविधाओं की कमी बड़ी चिंता कोर्ट ने कहा कि सरकारी अस्पतालों में इलाज की सुविधाओं की कमी एक बड़ी चिंता की बात है। कोर्ट ने यह भी जानना चाहा कि प्रदेश में हाल ही में खोले गए नए मेडिकल कॉलेजों में इमरजेंसी इलाज के लिए जरूरी उपकरण, वेंटिलेटर और विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध हैं या नहीं। जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की बेंच आशुतोष कुमार सिंह की PIL याचिका पर सुनवाई कर रही थी। बेंच ने चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के अपर मुख्य सचिव, केजीएमयू के कुलपति, डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान और एसजीपीजीआई के निदेशक या उनके जिम्मेदार अधिकारी और सुलतानपुर के सीएमओ को अगली सुनवाई में वीडियो कांफ्रेंसिंग से मौजूद रहने का आदेश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 11 सितंबर को होगी। कोर्ट ने कहा कि जब नए मेडिकल कॉलेजों में डिलीवरी और गंभीर मरीजों का इलाज हो रहा है, तो वहां इमरजेंसी से निपटने के लिए जरूरी विशेषज्ञ डॉक्टर और उपकरण जरूर होने चाहिए। कोर्ट ने प्रदेश के नए मेडिकल कॉलेजों में इलाज की सुविधाओं और विशेषज्ञ डॉक्टरों की स्थिति की जानकारी भी मांगी है।
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इलाज न मिलने से नवजात की मौत, हाईकोर्ट सख्त:सुलतानपुर मेडिकल कॉलेज में वेंटिलेटर-डॉक्टर नहीं मिले; नए कॉलेजों से मांगा ब्योरा