अपहरण और गैंगरेप का आरोपी 35 साल बाद बरी:बांदा के मामले में हाईकोर्ट ने संदेह लाभ देकर सजा रद्द की


इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वर्ष 1989 के एक अपहरण और सामूहिक दुष्कर्म के मामले में लगभग 35 साल बाद फैसला सुनाते हुए दोषियों की सजा रद्द कर दी है। कोर्ट ने पीड़िता की उम्र को लेकर अभियोजन पक्ष की ओर से पेश सबूतों को अपर्याप्त और असंतोषजनक मानते हुए आरोपियों को संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया है। बांदा जिला अदालत से हुई थी सजा यह फैसला न्यायमूर्ति तेज प्रताप तिवारी ने सुनाया है। इस मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (दुष्कर्म) 363 (अपहरण) और 366 (अपहरण कर विवाह/अनैतिक कार्य के लिए विवश करना) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था। बांदा के द्वितीय अपर सत्र न्यायाधीश ने 19 नवंबर 1991 को अपने फैसले में राम चरण और राजा राम को धारा 366 आईपीसी में 3 वर्ष कठोर कारावास की सजा सुनाई। साथ ही अलग अलग जुर्माना भी लगाया गया था। सभी सजाएं साथ साथ चलनी थीं। अपील के दौरान आरोपी राम दीन की मृत्यु हो जाने से उसकी अपील समाप्त हो गई और मामला केवल राम चरण, राजा राम और राम कुमार के लिए तय हुआ। बचाव पक्ष ने दी दलीलें बचाव पक्ष की ओर से मुख्य तर्क यह था कि घटना के समय पीड़िता बालिग थी, इसलिए धारा 366 और 376 का अपराध नहीं बनता। इसके समर्थन में पीड़िता के भाई महेश के बयान का हवाला दिया गया, जिसमें उसने अपनी उम्र करीब 25 वर्ष बताई थी और कहा था कि उससे बड़ी दो बहनें और दो भाई हैं, तथा पीड़िता सबसे छोटी संतान है। बचाव पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के दो अहम फैसलों जय माला बनाम गृह सचिव, जम्मू कश्मीर सरकार और मध्य प्रदेश राज्य बनाम मुन्ना उर्फ शंभू नाथ का हवाला देते हुए कहा कि उम्र के निर्धारण में अस्थि परीक्षा में दो वर्ष तक का अंतर संभव होता है और स्पष्ट प्रमाण के अभाव में आरोपियों को संदेह का लाभ मिलना चाहिए। बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि सत्र न्यायालय ने धारा 313 सीआरपीसी के तहत आरोपियों से पूछताछ के दौरान अभियोग से जुड़ी परिस्थितियों पर ठीक से सवाल नहीं पूछे, जो कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के विपरीत है।
संदेह लाभ देकर कोर्ट ने सजा खत्म की
राज्य सरकार की ओर से एजीए ने दलील दी कि पीड़िता के भाई की उम्र (25 वर्ष) और डॉक्टर की गवाही, जिसमें पीड़िता की उम्र 16-18 वर्ष के बीच बताई गई इससे यह स्पष्ट होता है कि पीड़िता नाबालिग थी।
न्यायमूर्ति तेज प्रताप तिवारी ने पाया कि पीड़िता की जांच करने वाली डॉक्टर सुरुचि सक्सेना और एक्स रे करने वाले डॉ एम सी मित्तल दोनों ने अपनी रिपोर्ट में उम्र का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया। पीड़िता ने स्वयं अपनी गवाही में अपनी उम्र 17 वर्ष (जांच की तारीख 2 अगस्त 1991 को) बताई थी, और यह भी कहा कि उसकी शादी चार साल पहले हो चुकी थी। संदेह का लाभ देते हुए हाईकोर्ट ने बांदा सत्र न्यायालय के 19 नवंबर 1991 के आदेश को रद्द कर दिया और आपराधिक अपील को स्वीकार कर लिया।

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