MP में रक्षाबंधन से पहले CNG महंगी:भोपाल में 1.50 रुपए बढ़े दाम; 97.50 रुपए किलो हुआ रेट, अवंतिका-गेल पहले ही बढ़ा चुके


मध्य प्रदेश में रक्षाबंधन से पहले CNG महंगी हो गई है। भोपाल में थिंक गैस ने कीमत 1.50 रुपए बढ़ाकर 97.50 रुपए प्रति किलो कर दी है। भोपाल, राजगढ़ और शिवपुरी में थिंक गैस CNG की सप्लाई करती है। वहीं इंदौर, उज्जैन, ग्वालियर समेत अन्य जिलों में CNG की सप्लाई करने वाली अवंतिका और GAIL के रेट भी 97 रुपए प्रति किलो से ज्यादा चल रहे हैं। इससे पहले शक्कर के दाम 70 रुपए प्रति किलो के पार पहुंच चुके हैं। पिछले छह महीने में CNG के दाम करीब 10 रुपए प्रति किलो तक बढ़े हैं। जून में प्रदेश में CNG का रेट करीब 94.55 रुपए था, जो जुलाई के अंत तक 97.50 रुपए पहुंच गया। प्रदेश में 3 कंपनियों की सप्लाई मध्य प्रदेश में 3 गैस एजेंसियां- थिंक, गेल और अवंतिका सीएनजी की सप्लाई करती हैं। भोपाल, राजगढ़ और शिवपुरी जिलों में थिंक कंपनी सप्लाई करती है, जबकि इंदौर, उज्जैन, ग्वालियर संभाग में अवंतिका की सप्लाई है। गेल कंपनी की भी कई जिलों में सप्लाई है। इनमें देवास, रायसेन, शाजापुर और सीहोर जिले भी शामिल हैं। भोपाल के 31 पंपों पर सीएनजी राजधानी में कुल 152 पेट्रोल पंप है। इनमें से 12 पंप ऐसे हैं। जहां सीएनजी गैस भी मिलती है। वहीं थिंक गैस के मैनिट, नीलबड़, होशंगाबाद रोड, बैरागढ़ रोड समेत कई जगहों पर भी कुल 31 स्टेशन है। यहां पर रेट बढ़े हैं। थिंक कंपनी जिन जगहों पर खुद पंप संचालित करती है, वहां रेट 97 रुपए है, जबकि डीलरशिप वाले पंपों पर यह 97.50 रुपए प्रतिकिलो बिक रही है। 50% तक बढ़ी CNG गाड़ियों की बिक्री पिछले तीन साल में भोपाल में सीएनजी गाड़ियों की बिक्री 50% तक बढ़ी है। शोरूम से हर रोज सीएनजी बेस्ड 10 से 15 गाड़ियां बिक रही है। इसकी मुख्य वजह पेट्रोल-डीजल के मुकाबले सीएनजी से एवरेज ज्यादा मिलना है। वहीं, सीएनजी के रेट भी कम है। अब जानिए नॉलेज पार्ट… सीएनजी क्या है और यह कैसे बनती है?
सीएनजी का पूरा नाम कंप्रेस्ड नेचुरल गैस है। यह मुख्य रूप से मीथेन गैस से बनती है और पेट्रोल-डीजल के मुकाबले बहुत कम प्रदूषण फैलाती है। यह गैस जमीन के नीचे बने तेल और गैस के कुओं से प्राकृतिक रूप से निकलती है। इसके बाद फैक्ट्रियों में इसे रिफाइन करके इसकी नमी और अशुद्धियां साफ की जाती हैं। फिर इस प्राकृतिक गैस पर बहुत ज्यादा प्रेशर डाला जाता है, जिससे यह भारी गैस कम जगह में सिमट जाती है। इसी दबी हुई गैस को सिलेंडरों में भरकर गाड़ियों में ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

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