IMSBHU में 21.89 करोड़ की चिकित्सा खरीद पर उठे सवाल:विजिलेंस टीम ने शुरू की जांच, जिम्मेदारों से मांगा गया जवाब


काशी हिंदू विश्वविद्यालय के इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में सरकारी खरीद प्रणाली (GeM) के माध्यम से की गई 21.89 करोड़ रुपये की चिकित्सा उपकरण खरीद अब विवादों के केंद्र में आ गई है। इस मामले में विजिलेंस की टीम जांच के लिए बीएचयू पहुंची है। सूत्रों के अनुसार टीम ने खरीद प्रक्रिया से जुड़े जिम्मेदार अधिकारियों से पूछताछ की और टेंडर से संबंधित कई महत्वपूर्ण दस्तावेजों की जांच की। हालांकि पूरे घटनाक्रम पर विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। मामले की शुरुआत कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी को भेजे गए एक विस्तृत शिकायत पत्र से हुई, जिसमें आईएमएस के शीर्ष अधिकारियों पर वित्तीय अनियमितताओं, नियमों की अनदेखी और खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं बरतने के गंभीर आरोप लगाए गए हैं। शिकायतकर्ता सत्येंद्र कुमार ने अपने पत्र में निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। सीएसआर फंड से हुई खरीद पर सवाल शिकायत में कहा गया है कि जिस कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर) निधि से यह खरीद की गई, उसी से संबंधित सेल के गठन, तकनीकी विनिर्देश तय करने, खरीद प्रस्ताव तैयार करने और निविदा प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में सीमित अधिकारियों की प्रमुख भूमिका रही। शिकायतकर्ता का आरोप है कि यदि नीति निर्माण से लेकर अंतिम खरीद निर्णय तक एक ही अधिकारी समूह शामिल रहा, तो यह हितों के संभावित टकराव (Conflict of Interest) का मामला हो सकता है।
कीमतों में भारी अंतर का दावा टेंडर के तहत छह एयरबोर्न बायोलॉजिकल कंट्रोल सिस्टम खरीदे गए। शिकायत में दावा किया गया है कि इन उपकरणों की औसत कीमत लगभग 3.64 करोड़ रुपये प्रति यूनिट रही। जबकि वर्ष 2024 में देश के अन्य प्रमुख चिकित्सा संस्थानों, जैसे शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज और एम्स, ने इसी श्रेणी के उपकरण 60 से 66 लाख रुपये प्रति यूनिट की दर से खरीदे थे। शिकायतकर्ता का कहना है कि बीएचयू के पुराने खरीद रिकॉर्ड के विश्लेषण से भी लगभग 9.74 करोड़ रुपये की मूल्य विसंगति प्रथम दृष्टया सामने आती है। इसी आधार पर खरीद प्रक्रिया की स्वतंत्र जांच की मांग की गई है। निविदा प्रक्रिया पर भी उठे सवाल शिकायत में आरोप लगाया गया है कि 10 करोड़ रुपये से अधिक की प्रत्येक सरकारी निविदा में स्वतंत्र बाहरी मॉनिटर (Independent External Monitor-IEM) की नियुक्ति अनिवार्य होती है, लेकिन इस निविदा में इस प्रावधान का पालन नहीं किया गया। इसके अलावा स्थानीय सामग्री (Local Content) प्रमाणपत्र का भी स्वतंत्र सत्यापन नहीं कराया गया। शिकायतकर्ता ने यह भी कहा है कि पूरी निविदा प्रक्रिया में केवल एक ही बोलीदाता ने भाग लिया। सामान्य वित्तीय नियम (GFR) के अनुसार यदि किसी निविदा में केवल एक ही बोली प्राप्त होती है, तो संबंधित विभाग को दरों का स्वतंत्र मूल्यांकन कराना और प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के प्रयास करना चाहिए। आरोप है कि इस मामले में मात्र 21 दिन की सीमित अवधि देकर निविदा जारी की गई, जिससे व्यापक प्रतिस्पर्धा नहीं हो सकी। आपूर्ति और भुगतान पर भी सवाल शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि अनुबंध छह पूर्ण इकाइयों की आपूर्ति का था, जबकि भुगतान से जुड़े दस्तावेजों में केवल 4.412 इकाइयों की आपूर्ति दर्शाते हुए भुगतान प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई। इसके अतिरिक्त एयर प्यूरीफायर श्रेणी के उपकरणों पर सामान्यतः 18 प्रतिशत जीएसटी लागू होता है, लेकिन आपूर्तिकर्ता के चालान में कथित रूप से अलग एचएसएन कोड का उपयोग कर पांच प्रतिशत जीएसटी लगाया गया। शिकायतकर्ता ने इसकी भी जांच कराने की मांग की है। आईएमएस प्रशासन ने आरोपों को किया खारिज आईएमएस निदेशक प्रो. एस.एन. संखवार ने सभी आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि उपकरणों की खरीद सीएसआर फंड के अंतर्गत निर्धारित मानकों और विश्वविद्यालय की स्वीकृत प्रक्रिया के अनुसार की गई है। उनके अनुसार पूरी खरीद GeM पोर्टल पर खुली और प्रतिस्पर्धी निविदा प्रक्रिया के माध्यम से हुई, जिसमें निर्धारित नियमों का पालन किया गया। उन्होंने कहा कि परियोजना की समय-सीमा, तकनीकी आवश्यकताओं और वित्तीय पहलुओं को ध्यान में रखते हुए इसे टर्नकी प्रोजेक्ट के रूप में लागू किया गया। विजिलेंस जांच पर टिकी निगाहें सूत्रों के अनुसार विजिलेंस टीम ने खरीद प्रक्रिया, टेंडर दस्तावेज, भुगतान रिकॉर्ड और अन्य संबंधित फाइलों की जांच शुरू कर दी है। जांच के दौरान संबंधित अधिकारियों से पूछताछ भी की गई है। हालांकि विश्वविद्यालय प्रशासन ने अभी तक जांच को लेकर कोई औपचारिक टिप्पणी नहीं की है। अब पूरे मामले में विजिलेंस जांच की रिपोर्ट का इंतजार है। जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि शिकायत में लगाए गए आरोपों में कितना तथ्य है और खरीद प्रक्रिया में किसी प्रकार की अनियमितता हुई है या नहीं।

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