फतेहपुर 1986 के हत्याकांड के आरोपी को बरी किया:हाईकोर्ट का फैसला, कहा आरोप साबित करने में फेल हुआ अभियोजन


इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फतेहपुर में 1986 के बहुचर्चित हत्याकांड के एक आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।
कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोप को संदेह से परे साबित करने में नाकाम रहा। यह आदेश न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा एवं न्यायमूर्ति जेके उपाध्याय की खंडपीठ ने सजायाफ्ता जगदीश की अपील पर सुनवाई के बाद दिया है। 18 जुलाई 1986 का हत्याकांड फतेहपुर के खागा थानाक्षेत्र में 18 जुलाई 1986 को कुंजल प्रसाद की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। आरोप था कि बचन सिंह, जगदीश, जोगेश्वर और राम कुमार ने गवियन तालाब के पास कुंजल को घेरकर गोली मार दी। सेशन कोर्ट ने वर्ष 1987 में अभियुक्तों को आईपीसी की धारा 302/34 के तहत अपराध दोषी ठहराया था। इस निर्णय के खिलाफ अपील लंबित रहने के दौरान आरोपी राम कुमार की मृत्यु हो गई तो उसके खिलाफ अपील समाप्त हो गई। अभियोजन ने आरोपों को साबित करने के लिए दो चश्मदीद गवाह और पोस्टमार्टम रिपोर्ट पेश की। कोर्ट ने इन तथ्यों पर विचार के बाद पाया कि दोनों चश्मदीद गवाह के बयान आपस में मेल नहीं खाते। एक ने कहा कि वे साथ घर से निकले जबकि दूसरे ने कहा कि रास्ते में अचानक मुलाकात हुई। संदेहास्पद हों तो दोषसिद्धि कायम नहीं गवाहों की घटनास्थल पर उपस्थिति भी संदेहास्पद पाई गई। गांव में मजदूर उपलब्ध होने के बावजूद दूसरे गांव जाने का कारण अविश्वसनीय लगा। कोर्ट ने कहा कि दोनों पक्षों के बीच पुरानी रंजिश थी, जिससे झूठा फंसाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। गवाहों ने अपने बयान में तीन गोलियां चलने की बात कही जबकि डॉक्टर ने चार निशान बताए। डॉक्टर के अनुसार एक गोली बहुत करीब से चली, जबकि गवाहों ने सातसे दस कदम दूरी बताई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में शरीर की स्थिति भी घटनाक्रम से मेल नहीं खाती। कोर्ट ने कहा कि यदि आरोपी बदला लेना चाहते थे तो चश्मदीद बेटे को क्यों छोड़ा गया। इससे पूरी कहानी संदिग्ध हो जाती है। कोर्ट ने कहा कि जब घटनाक्रम और साक्ष्य ही संदेहास्पद हों तो दोषसिद्धि कायम नहीं रखी जा सकती। कोर्ट ने माना कि अभियोजन का मामला संदेह से परे साबित नहीं हुआ इसलिए आरोपी को संदेह का लाभ दिया जाना उचित है। साथ ही जगदीश को बरी करने का आदेश देते हुए उसकी जमानत समाप्त कर दी और जमानतदारों को मुक्त कर दिया।

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