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इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने अयोध्या की आवासीय योजनाओं के लिए चल रही भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया को रद्द करने से इनकार कर दिया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद अधिनियम, 1965 के तहत अधिग्रहित भूमि के मालिकों को मुआवजा, पुनर्वास और पुनर्स्थापन के मामले में वर्ष 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून से कम लाभ नहीं दिया जा सकता। न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने जनहित याचिका सहित कई याचिकाओं का निपटारा करते हुए 173 पृष्ठों का विस्तृत फैसला सुनाया। न्यायालय ने आवास एवं विकास परिषद अधिनियम की धारा 28, 31 और 32 की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा। हालांकि, धारा 55 की ऐसी व्याख्या की गई कि उसके तहत होने वाले सभी भूमि अधिग्रहण में भी भू-स्वामियों को 2013 के कानून के अनुरूप उचित मुआवजा, पुनर्वास और पुनर्स्थापन के अधिकार मिलेंगे। न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि अयोध्या की संबंधित आवासीय योजनाएं वर्ष 2020 से संचालित समेकित विकास परियोजना का हिस्सा हैं। इन योजनाओं के लिए भूमि खरीद, लैंड पूलिंग और अधिग्रहण के माध्यम से उपलब्ध कराई गई है। कई चरणों में अवार्ड पारित हो चुके हैं और अधिग्रहित भूमि का कुछ हिस्सा तीसरे पक्षों को आवंटित भी किया जा चुका है। ऐसे में इस स्तर पर भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया को रद्द करना सार्वजनिक हित और विकास परियोजना, दोनों के प्रतिकूल होगा। हाईकोर्ट ने परिषद को निर्देश दिया कि सभी प्रभावित भू-स्वामियों को 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून के अनुरूप मुआवजा दिया जाए। आवश्यकता होने पर पहले से पारित अवार्डों की समीक्षा कर उनमें संशोधन किया जाए। इसके साथ ही, जिन परिवारों की पूरी भूमि या संपत्ति अधिग्रहित होने से वे पूरी तरह विस्थापित हो गए हैं, उनके लिए छह माह के भीतर पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन योजना तैयार कर उसे लागू किया जाए।
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अयोध्या भूमि अधिग्रहण पर लखनऊ हाईकोर्ट की मुहर:भू-स्वामियों को 2013 कानून के बराबर मुआवजा, पुनर्वास का लाभ मिलेगा