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काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में मेडिकल सुपरिंटेंडेंट (एमएस) के पद पर जारी भर्ती प्रक्रिया विवादों में घिर गई है। छात्र नेता मृत्युंजय तिवारी द्वारा एक जनहित याचिका दायर कर इस प्रक्रिया को चुनौती दी गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने अयोग्य अभ्यर्थियों को शॉर्टलिस्ट कर उन्हें अनुचित लाभ पहुँचाने का प्रयास किया है, जिससे पूरी भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। जानिये क्या है मामला याचिका के अनुसार, बीएचयू द्वारा जारी विज्ञापन में स्पष्ट रूप से यह अनिवार्य पात्रता निर्धारित की गई थी कि अभ्यर्थी के पास 300 या उससे अधिक बेड वाले अस्पताल में वरिष्ठ पद पर न्यूनतम 7 वर्ष का व्यावहारिक अनुभव होना चाहिए। यह एक आवश्यक योग्यता थी, न कि वांछनीय। इसके बावजूद, शॉर्टलिस्ट किए गए 14 अभ्यर्थियों में से अधिकांश के पास ऐसा कोई अनुभव स्पष्ट नहीं है।
आरोप है कि विश्वविद्यालय ने विभागाध्यक्ष, नोडल अधिकारी या प्रोफेसर इंचार्ज के रूप में कार्य करने के अनुभव को ही अस्पताल प्रशासन के समकक्ष मान लिया, जबकि विभागीय प्रशासन और पूरे अस्पताल के प्रशासन की जिम्मेदारियाँ पूरी तरह अलग होती हैं। याचिका में कई आरोप इसके अतिरिक्त, शॉर्टलिस्ट किए गए उम्मीदवारों में से 13 आंतरिक (इन-हाउस) अभ्यर्थी हैं, जो नियमों में शिथिलता बरतने की ओर इशारा करता है। याचिका में यह भी कहा गया है कि यह प्रक्रिया राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के नियामक ढाँचे और बीएचयू व भारत सरकार के बीच हुए त्रिपक्षीय समझौते का उल्लंघन है, जिसके तहत आईएमएस-बीएचयू को एम्स मॉडल पर विकसित किया जाना था। याचिकाकर्ता ने विज्ञापन की शर्तों के उल्लंघन को ‘चयन प्रक्रिया शुरू होने के बाद नियम बदलने’ के समान बताते हुए उच्च न्यायालय से इस पूरी भर्ती प्रक्रिया की न्यायिक समीक्षा करने और निष्पक्षता सुनिश्चित करने की गुहार लगाई है।
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बीएचयू में एमएस की नियुक्ति पर हाईकोर्ट में याचिका:अयोग्य अभ्यर्थियों को शॉर्टलिस्ट करने का आरोप, कोर्ट में होगी सुनवाई