वाराणसी में सिनेमा हाल की जमीन पर होटल निर्माण होगा:113 साल पुराने बैनामे के आगे झुका "तालाब" का दावा


इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नगर निगम, वाराणसी के उस पत्र को रद्द कर दिया है जिसमें एक होटल परियोजना के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र यह कहकर देने से इन्कार किया गया था कि संबंधित जमीन वर्ष 1884 के राजस्व अभिलेखों में तालाब के रूप में दर्ज थी। न्यायमूर्ति नीरज तिवारी और न्यायमूर्ति सुधांशु चौहान की खंडपीठ ने मेसर्स नॉट्स इंडिया कारपेट्स प्राइवेट लिमिटेड की याचिका को स्वीकार करते हुए यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। सिनेमाहाल की जमीन का मामला मामला वाराणसी के मिसिर पोखरा स्थित मशहूर “मज़दा सिनेमा” की भूमि (अराजी संख्या 2404) से जुड़ा है, जहां याची कंपनी लगभग 100 करोड़ रुपये के निवेश से एक स्टार होटल बनाना चाहती है। नगर निगम, वाराणसी के अपर नगर आयुक्त ने 24 जनवरी 2026 के पत्र के ज़रिए अनापत्ति देने से इन्कार करते हुए तर्क दिया था कि फसली वर्ष 1291 (सन् 1884) के राजस्व अभिलेखों में यह भूमि तालाब के रूप में दर्ज थी। इसी आधार पर उत्तर प्रदेश ज़मींदारी उन्मूलन अधिनियम की धाराओं के तहत कार्रवाई भी शुरू कर दी गई थी। याची की ओर से बताया गया कि यह भूमि वर्ष 1913 में नगर पालिका बोर्ड, बनारस द्वारा एक पंजीकृत बैनामे के जरिए महाराजा महिंद्र चंद्र नंदी को बेची गई थी, जिसमें साफ तौर पर भूमि पर निर्माण मौजूद होने का उल्लेख है। इसके बाद यह संपत्ति कई हाथों से होते हुए वर्ष 2011 में याची कंपनी के पास आई। 1927 से ही यह संपत्ति नगर निगम के अभिलेखों में हाउस टैक्स और वाटर टैक्स के लिए दर्ज है, और 1954 (फसली 1361) से लगातार “आबादी” भूमि के रूप में दर्ज चली आ रही है। नगर आयुक्त ने दाखिल किया हलफनामा अदालत के आदेश पर प्रमुख सचिव, नगर विकास विभाग और नगर आयुक्त, वाराणसी ने व्यक्तिगत हलफनामे दाखिल किए, जिनमें आईआईटी-बीएचयू की एक रिपोर्ट का हवाला दिया गया। कोर्ट ने पाया कि यह रिपोर्ट भी याचिका दाखिल होने के बाद तैयार कराई गई थी, और खुद रिपोर्ट में स्वीकार किया गया कि मौके पर कोई जलाशय मौजूद नहीं है। जमीन मिट्टी, गाद और मलबे से भरी हुई है, इसलिए वहां किसी भी पुनर्विकास कार्य को “नए तालाब निर्माण” के नियमों आंख के तहत ही किया जाना चाहिए। फसली वर्ष 1291 के बाद के अभिलेख या तो उपलब्ध नहीं हैं या जर्जर हालत में हैं, जिन पर प्रशासन ने भरोसा भी नहीं किया।फसली 1361 से लगातार भूमि “आबादी” के रूप में दर्ज है।यह इलाका वाराणसी के घनी आबादी वाले लक्सा क्षेत्र में स्थित है।याची की जमीन पर ही कार्रवाई केंद्रित करना और शेष 0.688 हेक्टेयर अराजी पर कोई कदम न उठाना भेदभावपूर्ण और संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।113 वर्ष पुराने वैध, पंजीकृत बैनामे की सत्यता को नगर निगम ने कभी चुनौती नहीं दी, इसलिए अब वह इस स्थिति से पीछे नहीं हट सकता । कोर्ट ने हींच लाल तिवारी, जगपाल सिंह और जितेंद्र सिंह जैसे सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर भी विचार किया, लेकिन कहा कि वे मामले अलग तथ्यों पर आधारित थे। इसके बजाय राज्य बनाम अल्ट्राटेक सीमेंट (2022) के फैसले का हवाला देते हुए कहा गया कि जब मौके पर वास्तव में कोई जलाशय मौजूद ही नहीं है, तो केवल पुराने अभिलेखों के आधार पर अनुमति रोकना उचित नहीं। कोर्ट ने 24 जनवरी 2026 के पत्र को रद्द करते हुए नगर निगम को निर्देश दिया कि वह चार सप्ताह के भीतर याची के अनापत्ति आवेदन पर नए सिरे से विचार करे। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि राजस्व संहिता के तहत चल रही अलग कार्यवाही पर याची उचित मंच पर आपत्ति उठाने के लिए स्वतंत्र होगा।

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