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इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि हुक्का बार का संचालन संविधान के तहत मौलिक अधिकार नहीं है। अदालत ने कहा कि जनहित में तंबाकू और निकोटीन से जुड़े व्यवसायों पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है। न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने हुक्का बार संचालकों द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि हुक्का बार चलाना उनका व्यवसाय और मौलिक अधिकार है, और प्रशासन उन्हें बंद करा रहा है या लाइसेंस नहीं दे रहा है। न्यायालय ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि हुक्का बार में तंबाकू और निकोटीन का सेवन होता है, जो जनस्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है। इसलिए राज्य सरकार को ऐसी गतिविधियों पर रोक लगाने का अधिकार है। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि हुक्का बार का कारोबार शराब और जुए जैसे व्यवसायों की श्रेणी में आता है, जिन्हें सामान्य व्यापारिक अधिकारों के समान संरक्षण नहीं दिया जा सकता। अदालत ने याद दिलाया कि कोविड-19 महामारी के दौरान संक्रमण फैलने के खतरे को देखते हुए उत्तर प्रदेश में हुक्का बारों पर प्रतिबंध लगाया गया था। इस मामले की अगली सुनवाई 14 जुलाई को निर्धारित की गई है।
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हुक्का बार मौलिक अधिकार नहीं:इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा- जनस्वास्थ्य के लिए सरकार लगा सकती है रोक