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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किशोर न्याय एक्ट, 2015 सामान्य आपराधिक कानूनों पर प्रभावी है।
यदि कोई आरोपी घटना की तिथि पर किशोर है और एफआईआर गंभीर अपराध की है, तो उसके खिलाफ नियमित एफआईआर दर्ज नहीं की जा सकती। न्यायमूर्ति न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव की एकलपीठ ने औरैया जिले के दो किशोरों से जुड़े मामले में दाखिल चार्जशीट, संज्ञान, सम्मन आदेश एवं किशोर न्याय बोर्ड में लंबित पूरी केस कार्यवाही को रद्द कर दिया। उम्र 18 से कम, दाखिल हुई चार्जशीट आरोप था कि किशोरों ने मारा पीटा एवं धन मांगा। पुलिस जांच में दोनों आरोपियों की आयु 18 वर्ष से कम पाई गई, इसके बावजूद नियमित एफआईआर दर्ज कर चार्जशीट दाखिल कर दी गई। याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन) मॉडल रूल्स, 2016 के नियम 8 के तहत “जघन्य अपराध” को छोड़कर किसी भी किशोर के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं की जा सकती। ऐसे मामलों में केवल जनरल डायरी में सूचना दर्ज करने तथा सोशल बैकग्राउंड रिपोर्ट तैयार करने का प्रावधान है। हाईकोर्ट ने माना कि जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की धारा 1(4) इस अधिनियम को सामान्य दंड प्रक्रिया पर वरीयता प्रदान करती है। कोर्ट ने कहा कि जब विशेष कानून लागू हो, तब सामान्य पुलिस प्रक्रिया अपनाना विधि विरुद्ध माना जाएगा। न्यायालय ने यह भी कहा कि जुवेनाइल जस्टिस एक्ट एक सुधारात्मक एवं बाल हित संरक्षण कानून है, जिसका उद्देश्य दंड देना नहीं बल्कि सुधार एवं पुनर्वास सुनिश्चित करना है। इसलिए अधिनियम में निर्धारित विशेष प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि यदि किसी कार्यवाही पर स्पष्ट कानूनी रोक हो तो उच्च न्यायालय उसे निरस्त कर सकता है।
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किशोर न्याय कानून बाल अपराध में सर्वोपरि-हाईकोर्ट:याची के विरुद्ध केस कार्यवाही रद्द, कानून के मुताबिक कार्यवाही की छूट