बाल गृहों के फंड में देरी पर लखनऊ हाईकोर्ट सख्त:कहा- बच्चों के मामलों में प्रशासनिक ढिलाई अस्वीकार्य


इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने मिशन वात्सल्य योजना के तहत बाल गृहों को मिलने वाली सहायता राशि जारी करने में हो रही देरी पर कड़ा रुख अपनाया है। न्यायालय ने इसे बच्चों के हितों से जुड़े मामलों में गंभीर चिंता का विषय बताया। मामले की अगली सुनवाई 27 मई को निर्धारित की गई है। न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह की खंडपीठ ने अनुप गुप्त द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। यह याचिका वर्ष 2008 में दाखिल की गई थी। सुनवाई के दौरान, राज्य सरकार ने न्यायालय को बताया कि दृष्टि सामाजिक संस्थान को प्रस्तावित एक करोड़ रुपये की सहायता राशि प्रोजेक्ट अप्रूवल बोर्ड की बैठक के बाद ही जारी की जा सकेगी। यह बैठक पहले 27 अप्रैल को प्रस्तावित थी, जिसे अब 12 मई को आयोजित किया जाएगा। सरकार ने यह भी जानकारी दी कि स्पर्श योजना के तहत वित्तीय भुगतान प्रणाली में बदलाव किया गया है। पहले भुगतान केंद्रीय साइबर ट्रेजरी के माध्यम से होता था, जिससे व्यवहारिक समस्याएं आ रही थीं। अब जिला स्तर पर भुगतान व्यवस्था लागू की गई है, हालांकि मौजूदा वित्तीय वर्ष की मंजूरी अभी भी बोर्ड की बैठक पर निर्भर है। इस पर न्यायालय ने टिप्पणी की कि जब नया वित्तीय वर्ष अप्रैल से शुरू हो जाता है, तो आवश्यक बैठकों और स्वीकृतियों की प्रक्रिया पहले ही पूरी कर ली जानी चाहिए। न्यायालय ने जोर दिया कि योजनाओं में देरी का सीधा असर बाल गृहों में रह रहे बच्चों पर पड़ता है। खंडपीठ ने यह भी संज्ञान लिया कि संबंधित संस्था को बच्चों की देखभाल जारी रखने के लिए उधार लेना पड़ रहा है और अब उन्हें कर्ज मिलना भी कठिन हो गया है। अदालत ने केंद्र सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को निर्देश दिया कि भविष्य में बोर्ड की बैठकें समय पर आयोजित की जाएं, ताकि सहायता राशि जारी करने में अनावश्यक विलंब न हो।

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