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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पत्नी की दहेज हत्या व हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा पाए पति को आरोप से बरी कर दिया।
कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा कि घटना के समय पति घर में मौजूद था या उसी ने हत्या की थी।
कोर्ट ने यह भी माना कि ट्रायल कोर्ट ने केवल इस आधार पर पति को दोषी ठहरा दिया कि मृतका की मौत ससुराल में हुई थी जबकि कानूनन यह पर्याप्त नहीं है। जानिये क्या है मामला यह आदेश न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा एवं न्यायमूर्ति प्रशांत मिश्र प्रथम की खंडपीठ ने दिया है। रामपुर जिले के मिलक थाने के इस मामले के तथ्यों के अनुसार मृतका के परिजनों का आरोप था कि शादी के बाद से ही पति, सास-ससुर और अन्य ससुरालीजन अतिरिक्त दहेज के रूप में एक लाख रुपये, कार व मकान निर्माण के लिए धन मांग कर रहे थे। मांग पूरी न होने पर मृतका को प्रताड़ित किया जाता था। 15 अगस्त 2017 का मामला 15 अगस्त 2017 को मृतका के चाचा ने एफआईआर में आरोप लगाया कि 14-15 अगस्त की रात ससुराल वालों ने उसकी गला दबाकर हत्या कर दी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण एंटी मॉर्टम थ्रॉटलिंग से उत्पन्न श्वास अवरोध बताया गया, हालांकि डॉक्टरों ने विसरा भी सुरक्षित रखा था। ट्रायल कोर्ट ने पति महिपाल को आईपीसी की धारा 302 के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास और 30 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई जबकि अन्य आरोपियों को बरी कर दिया। इसी फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में आपराधिक अपील की गई। गवाहों के बयानों में विरोधाभास हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयानों में कई महत्वपूर्ण विरोधाभास थे। कोर्ट ने कहा कि मृतका की बड़ी बहन की शादी उसी गांव में हुई थी और उसे सबसे महत्वपूर्ण गवाह माना जा सकता था लेकिन अभियोजन ने अदालत में पेश ही नहीं किया। जबकि वही दहेज उत्पीड़न के आरोपों की पुष्टि या खंडन के लिए सबसे उपयुक्त गवाह हो सकती थी। पिता और चाचा के बयान भी अलग कोर्ट ने कहा कि मृतका के पिता और चाचा के बयानों में यह विरोधाभास था कि घटना की सूचना किसने दी। एक ने कहा कि बड़ी बहन ने फोन कर सूचना दी जबकि दूसरे ने कहा कि सूचना किसी अज्ञात व्यक्ति ने दी थी। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन यह भी स्पष्ट नहीं कर सका कि घटना के समय पति वास्तव में घर में था या नहीं। रिकॉर्ड से पता चला कि आरोपी पेशे से ड्राइवर था और अक्सर काम के सिलसिले में घर से बाहर रहता था। ऐसे में केवल यह मान लेना कि पति ही अपराधी था, कानून के अनुरूप नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने ने कहा कि डॉक्टर ने जिरह में स्वीकार किया कि मृतका की चोटें फांसी लगने की स्थिति में भी संभव थीं। कोर्ट ने पाया कि गले पर लिगेचर मार्क था लेकिन गला दबाने के सामान्य संकेत, जैसे नाखून के निशान या हायॉइड बोन का टूटना स्पष्ट नहीं थे।
बचाव पक्ष के तीन गवाहों ने भी अदालत में बयान दिया कि मृतका ने कमरे का दरवाजा बंद कर चुन्नी से फांसी लगाई थी और बाद में दरवाजा तोड़कर उसे नीचे उतारा गया। उन्होंने यह भी कहा कि मृतका को ससुराल में प्रताड़ित नहीं किया जाता था। कोर्ट ने कहा कि जब समान साक्ष्यों के आधार पर अन्य आरोपियों को बरी कर दिया गया, तब केवल पति को दोषी ठहराना न्यायसंगत नहीं था। कोर्ट ने माना कि अभियोजन संदेह से परे अपराध सिद्ध करने में असफल रहा। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला रद्द करते हुए महिपाल को सभी आरोपों से सम्मानपूर्वक बरी कर दिया और किसी अन्य मामले में वांछित न होने पर उसकी तत्काल रिहाई का आदेश दिया।
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हाईकोर्ट ने उम्रकैद की सजा पाए पति को बरी किया:ट्रायल कोर्ट का फैसला पलटा, कहा पर्याप्त सबूत नहीं, गवाहों में विरोधाभास