![]()
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कोर्ट के निर्धारित समय पर बैठने की मांग वाली दायर एक जनहित याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि हाईकोर्ट के जजों के खिलाफ परमादेश (मैंडमस) जारी नहीं किया जा सकता है।
चीफ जस्टिस अरुण अंबानी और जस्टिस क्षितिज शैलेन्द्र की खंडपीठ ने यह आदेश हाईकोर्ट के अधिवक्ता अरूण मिश्रा की याचिका पर पारित किया। 2008 के प्रस्ताव को लागू करने की मांग याचिका दाखिल कर हाईकोर्ट जजों की पूर्णपीठ द्वारा 27 अगस्त 2008 को पारित प्रस्ताव को लागू करने की मांग की गई थी, जिसके अनुसार इलाहाबाद हाईकोर्ट की अदालतों में सुबह 10 बजे से दोपहर 1 बजे तक का समय और दोपहर 2 बजे से शाम 4 बजे तक का समय कोर्ट बैठने का निर्धारित किया गया है। याची व अधिवक्ता अरुण मिश्रा का आरोप है कि 5 मई 2026 को कई अदालतों में निर्धारित समय पर सुनवाई शुरू नहीं हुई। उनके अनुसार कुछ अदालतों में सुनवाई सुबह 10:05 बजे, कुछ में 10:10 बजे, 10:15 बजे और 10:20 बजे शुरू हुई जबकि कई अदालतें 10:30 बजे तक भी नहीं चलीं। लंच के बाद देरी से बैठने के दावे उन्होंने यह भी दावा किया कि हाईकोर्ट में दोपहर के भोजनावकाश के बाद भी ऐसी ही देर देखने को मिली। याचिका में कहा गया कि अदालत नियमित रूप से पूर्ण पीठ के प्रस्ताव का पालन नहीं करती है और इसकी पूर्व सूचना भी नहीं देती है। साथ ही यह भी मांग की गई कि अगर किसी अदालत के बैठने में देरी हो तो उसकी जानकारी नोटिस बोर्ड और वाद सूची में प्रकाशित की जाए, ताकि वकीलों और पक्षकारों को पहले से सूचना मिल सके। याची ने यह भी तर्क दिया कि अदालतों की बैठक में देरी के कारण अदालत के बजटीय दस्तावेजों का कानूनी उपयोग नहीं हो रहा है। हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि याचिका का आधार ही अधूरा है। कोर्ट ने कहा कि याची ने याचिका में यह नहीं स्पष्ट किया है कि जिस दिन कोर्ट समय पर नहीं बैठी उस दिन ज्यादा समय बैठकर न्यायिक कार्य पूरा किया। कोर्ट ने कहा याचिका भ्रमपूर्ण अदालत ने कहा कि दिन में कई बार अदालत में समय से अधिक समय बिताया जाता है। खण्डपीठ ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि हाईकोर्ट जजों के विरूद्ध परमादेश जारी करने की मांग को स्वीकार नहीं किया जा सकेगा। अदालत ने याचिका को भ्रमपूर्ण कहा और विधि सम्मत नहीं माना तथा खारिज कर दिया।
Source link
हाईकोर्ट जजों के खिलाफ परमादेश को मंजूरी नहीं:जजों को समय से बैठने के फुलकोर्ट प्रस्ताव की याचिका खारिज