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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जौनपुर में दर्ज एक आपराधिक मामले में दो सेवानिवृत्त नायब तहसीलदारों को अंतरिम राहत देते हुए उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगा दी।
न्यायमूर्ति अजय भनोट और न्यायमूर्ति दिवेश चंद्र सामंत की खंडपीठ ने यह आदेश जय सिंह मौर्य व एक अन्य की याचिका में पारित किया। क्या था मामला जानिये याचिकाकर्ता वर्ष 2014 और 2015 में नायब तहसीलदार के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। उनके खिलाफ 15 सितंबर 2026 को थाना लाइन बाजार, जिला जौनपुर में एफआईआर दर्ज हुई, जिसमें भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 420, 467, 468 और 471 लगाई गई हैं। आरोप 2011-2012 में की गई राजस्व प्रविष्टियों से जुड़े हैं। याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि संबंधित प्रविष्टियां सद्भावना में, पक्षकारों द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों और अभिवचनों के आधार पर अपने सरकारी कर्तव्य के निर्वहन में की गई थीं। प्राथमिकी विधि की प्रक्रिया का दुरुपयोग है, क्योंकि इसके जरिए राजस्व प्रविष्टियों से जुड़े दीवानी विवाद को आपराधिक मामले का रूप दिया जा रहा है।
बलि का बकरा बनाया गया
प्राथमिकी दुर्भावना से प्रेरित है और याचिकाकर्ताओं को बलि का बकरा बनाने तथा उनसे पैसे वसूलने के लिए इसका इस्तेमाल किया जा रहा है।कहा कि जब कोई आरोपी प्राथमिकी रद्द कराने के लिए धारा 482 सीआरपीसी या अनुच्छेद 226 के तहत अदालत आता है और दावा करता है कि कार्यवाही तुच्छ, तंग करने वाली या बदला लेने की नीयत से शुरू की गई है, तो अदालत का दायित्व है कि वह प्राथमिकी को अधिक सावधानी से देखे।
ऐसे मामलों में केवल प्राथमिकी के कथनों तक सीमित न रहकर रिकॉर्ड की अन्य परिस्थितियों और जांच में जुटाई गई सामग्री पर भी गौर किया जा सकता है। अपने पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सहारा लिया। यूपी सरकार से मांगा जवाब कोर्ट ने कहा कि मामले पर विचार की आवश्यकता है। कोर्ट ने राज्य सरकार व विपक्षी अधिवक्ताओं को चार सप्ताह में जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने अगली सुनवाई तक, या पुलिस रिपोर्ट दाखिल होने तक (जो भी पहले हो), याचिकाकर्ताओं की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी।
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सेवानिवृत्त नायब तहसीलदारों की गिरफ्तारी पर रोक:जौनपुर में दर्ज हुई एफआईआर, कोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब