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इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने आगरा के बसौनी थाना क्षेत्र से जुड़े एक दहेज उत्पीड़न व दहेज हत्या के मामले में सास स्मृति चंद्रकांता को जमानत दे दी है। बहू ने घरेलू विवाद के बाद फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। आवेदिका की ओर से कहा गया कि उसे बिना ठोस सबूत के, केवल सास होने के नाते फंसाया गया है और प्राथमिकी व बयान में विसंगतियां हैं। वह 18 मई 2026 से जेल में बंद है। आगरा के अफसर कुछ नहीं बता सके सुनवाई के दौरान विवेचना अधिकारी (सहायक पुलिस आयुक्त, आगरा) यह बताने में विफल रहे कि उन्होंने बीएनएसएस की धारा 180 के तहत प्रथम सूचनादाता का बयान दर्ज करते समय ऑडियो-वीडियो क्यों नहीं तैयार किया, जबकि डीजीपी के परिपत्र इसकी अनुमति देते हैं। कोर्ट ने कहा कि कई जांच अधिकारी जानबूझकर ऑडियो-वीडियो नहीं बनाते ताकि यह आरोप न लगे कि उन्होंने गवाहों के बयान खुद ही एफआईआर की नकल करके लिख दिए। अधिकारी तुरंत घटनास्थल पर पहुंचे कोर्ट का स्पष्ट मत है कि सूचना मिलते ही जांच अधिकारी तुरंत घटनास्थल पहुंचे और गवाहों के बयान बिना देरी दर्ज करें, संभवतः ई-साक्ष्य ऐप के जरिए ऑडियो-वीडियो सहित। केवल शिकायतकर्ता पक्ष ही नहीं, स्वतंत्र गवाहों के भी बयान दर्ज हों।बलात्कार व यौन उत्पीड़न मामलों में पीड़िता का बयान महिला पुलिस अधिकारी उसके निवास पर या सुविधानुसार दर्ज करे। 10 वर्ष या अधिक सजा वाले अपराधों में गवाहों को मजिस्ट्रेट के समक्ष बयान हेतु पेश किया जाए।अश्लील वीडियो मामलों में आरोपी का मोबाइल फोन जब्त कर एफएसएल भेजा जाए। कोर्ट ने डीजीपी यूपी को निर्देश दिया कि धारा 180 बीएनएसएस के तहत दर्ज बयानों का ऑडियो-वीडियो अनिवार्य करने पर विचार करें, ताकि जांच पारदर्शी व निष्पक्ष हो सके। आवेदिका को गवाहों को प्रभावित न करने, जांच में सहयोग करने और अपराध में लिप्त न होने की शर्तों पर व्यक्तिगत बॉन्ड व दो जमानतदारों पर रिहा करने का आदेश दिया गया है।
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शिकायतकर्ता व गवाहों के बयान की आडियो वीडियो जरुरी:हाईकोर्ट का डीजीपी को निर्देश, जांच अधिकारी कर रहे लापरवाही