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बाराबंकी का हेतमापुर गांव…1 महीने पहले तक यहां सब ठीक था। लेकिन, अचानक सरयू नदी ने अपना रास्ता बदला और तबाही मचा दी। 18 साल बाद आई भयानक बाढ़ में 25 पक्के मकान नदी में तिनके की तरह बह गए। कटान करते हुए नदी अब प्रसिद्ध महंत गुरु नारायण मंदिर तक पहुंच गई। वहीं, मस्जिद का एक हिस्सा नदी के ऊपर हवा में लटक रहा है। इसे बचाने के लिए विधायक से लेकर मंत्री तक सीएम योगी आदित्यनाथ के पास पहुंचे। सीएम ने डीएम को निर्देश दिया कि बजट की चिंता किए बिना किसी भी तरह मंदिर को बचाइए। दैनिक भास्कर की टीम जब स्थिति को देखने-समझने हेतमापुर गांव पहुंची, तो वहां उजड़ते आशियानों की बेबसी दिखाई दी। पढ़िए ग्राउंड रिपोर्ट… हेतमापुर गांव, जिला मुख्यालय से करीब 50 किलोमीटर दूर रामनगर तहसील में पड़ता है। यहां महंत गुरु नारायण मंदिर, बाबा नारायण दास की तपोस्थली और शंकरजी का मंदिर है। आसपास के जिलों से बड़ी संख्या में लोग यहां दर्शन करने आते थे। श्रद्धालुओं की अच्छी संख्या के चलते गांव के तमाम लोग प्रसाद, माला-फूल बेचते थे। इन्हीं मंदिरों के ठीक सामने एक मस्जिद भी है। कुल मिलाकर, ये धार्मिक स्थल गांव के तमाम लोगों के जीवनयापन का एक जरिया थे। रक्षाबंधन (28 अगस्त) तक यहां बाढ़ जैसी कोई स्थिति नहीं थी। लेकिन, अचानक सरयू नदी गांव की तरफ बढ़ने लगी। रफ्तार तेज हुई तो कटान भी शुरू हो गया। 500 बीघा से ज्यादा खेत कट गए। खेतों में कुछ ही दिन पहले ही धान की रोपाई की गई थी। इसके बाद गांव के घर कटने शुरू हुए। 5 सितंबर से लगातार घर नदी में समाने लगे। 11 सितंबर को अचानक नदी की धार तेज हो गई और एक साथ 10 घर नदी में समा गए। ‘बेटे ने 1-1 रुपया जोड़कर घर बनाया था, नदी लील गई’ महंत गुरु नारायण मंदिर के सामने मिठाई बेचने वाली कलावती का पक्का मकान नदी में समा चुका है। वह छप्पर बनाकर रह रही हैं। मिठाई बनाती कलावती आंसू पोंछते हुए कहती हैं- हमारा बड़ा-सा घर था, नदी लील गई। नाती-पोते जब पैसे मांगते हैं, तो समझ नहीं आता कहां से लाएं? बेटे ने पेट काटकर, एक-एक रुपया जोड़कर घर बनाया था। अब वह दिन-रात रो रहा है। ‘9 बीघा खेत कट गया, 4 बीघे में तैयार परवल डूब गए’ कलावती की तरह ही गांव के किनारे रहने वाले रामतेज का परिवार दहशत के साये में जी रहा है। उनका पक्का मकान अब नदी के कटान से सिर्फ 10 मीटर की दूरी पर है। रामतेज की पत्नी सुनीता छत पर खड़ी होकर उफनती नदी और कटान रोक रहे मजदूरों को एकटक निहारती हैं। सुनीता कहती हैं- हमारी 9 बीघा खेती नदी में बह गई। 4 बीघे में परवल की तैयार फसल थी, वह भी डूब गई। अब केवल यह मकान बचा है। अगर यह भी चला गया, तो हम सड़क पर आ जाएंगे। घर नहीं रहेगा, तो हमारे बच्चे बाहर कमाने कैसे जाएंगे? वे हमें इस हाल में अकेले छोड़कर नहीं जा सकते। पड़ोस में ही मनकवारा का घर है। आशंका है कि जल्द ही वह नदी में चला जाएगा। वे कहती हैं- 10-12 साल पहले घर बनाया था। बचाने के लिए खूब जतन किया। अब कोई उम्मीद बची नहीं है। पहले भी कटान हुआ था, लेकिन किसी का घर नहीं कटा था। अबकी बार तो कुछ बच नहीं रहा। आप लोग कुछ करिए कि हमें मदद मिल जाए। ये सब बोलते हुए उनकी आंखों में आंसू भर गए। 80 मजदूर मंदिर बचाने में जुटे, अगले 2 दिन बेहद अहम सरयू नदी की तबाही का दायरा अब गांव के सबसे पवित्र और आस्था के केंद्र तक पहुंच गया है। महंत गुरु नारायण मंदिर से महज कुछ मीटर की दूरी पर नदी का पानी हिलोरे मार रहा है। मंदिर को कटने से बचाने के लिए जिला प्रशासन ने 80 मजदूरों की टीम लगाई है। मजदूर लोहे के बड़े-बड़े जालों में पत्थरों के भारी-भरकम बोल्डर बांधकर नदी के किनारों पर गिरा रहे हैं, जिससे धार का रुख मोड़ा जा सके। साथ ही बोरियों में मिट्टी और गिट्टी भरकर कटान वाली जगहों पर डाली जा रही है। हालांकि, मंदिर से 200 मीटर दूर नदी अब दूसरी तरफ से जमीन काटने लगी है। अगले 2 से 3 दिन इस पूरे क्षेत्र के लिए बेहद संवेदनशील माने जा रहे हैं। दूसरी ओर, मंदिर के ठीक सामने बनी गांव की मस्जिद का लगभग आधा हिस्सा नदी में समा चुका है। बाकी हिस्सा हवा में लटक रहा है। ग्रामीणों में इसे लेकर नाराजगी और मलाल दोनों हैं। गांव के मुन्ना, जिनका 1 बीघे में बना घर और 15 बीघा जमीन सरयू में समा चुकी है, कहते हैं- हमारा घर-बार तो चला गया, उसका कोई गम नहीं। प्रशासन मंदिर बचाने के लिए मेहनत कर रहा है, यह बहुत अच्छी बात है। लेकिन, हमारी मस्जिद को भी बचाना था। अगर मस्जिद के पीछे भी 2-4 ट्राली पत्थर डाल दिए जाते, तो शायद वह बच जाती। वहीं, 30 बीघा जमीन गंवा चुके ग्रामीण नियाज बताते हैं कि करीब 90 लाख रुपए की संपत्ति आंखों के सामने नदी में चली गई। कटान की रफ्तार देखकर हमने अपने मकान के दरवाजे, खिड़कियां और ईंटें तक खुद ही उखाड़ ली हैं, ताकि जितना बचा सकें, बचा लें। गांव का नक्शा ही पूरी तरह बदल गया है। 40 करोड़ का बजट स्वाहा, 10 करोड़ से बने नए स्पर भी बह गए घाघरा-सरयू की बाढ़ बाराबंकी के लिए नई नहीं है। प्रशासनिक स्तर पर हुए निर्माण कार्यों की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। 2007 में गणेशपुर से चलहारी घाट तक 54.6 किलोमीटर लंबा विशाल बंधा बनाया गया था। जिससे करीब 150 गांवों को कटान से बचाया जा सके। इसी साल सरयू की कटान रोकने के लिए 40 करोड़ रुपए की लागत से 7 अलग-अलग परियोजनाओं को मंजूरी दी गई थी। इसके तहत नदी के किनारे 8 बेहद मजबूत ‘ठोकर’ (स्पर) बनाए गए थे। इसके बावजूद पिछले साल केदारीपुर और बबुरी जैसे गांव नदी में विलीन हो गए। इस साल भी योगी सरकार ने गणेशपुर-चलहारी बांध को मजबूती प्रदान करने के लिए 10 करोड़ 36 लाख रुपए का बजट स्वीकृत किया। इस राशि से तीन अति-संवेदनशील स्थानों पर बड़े स्पर बनाए गए, जिससे नदी की सीधी धार बांध और गांवों से न टकराए। नयापुरवा में बने नए ठोकर के पास का करीब 20 मीटर का हिस्सा नदी के दबाव को नहीं झेल पाया और पानी की तेज धार में बह गया। ठोकर टूटने से नदी की मुख्य धार सीधे हेतमापुर गांव के रिहाइशी इलाके से टकराने लगी और तबाही का दौर शुरू हो गया। सांसद बोले- अधिकारियों ने लापरवाही की, सीएम से शिकायत करेंगे हेतमापुर की इस त्रासदी के बाद राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है। स्थानीय कांग्रेस सांसद तनुज पुनिया ने बाढ़ और कटान प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया और ग्रामीणों का दर्द सुना। सांसद तनुज पुनिया ने सिंचाई एवं बाढ़ खंड के अधिकारियों पर भ्रष्टाचार और गंभीर लापरवाही के आरोप लगाए। उन्होंने कहा- हमने पिछले महीने ही बाढ़ नियंत्रण विभाग को लेटर लिखकर जानकारी मांगी थी कि मानसून से पहले कटान रोकने के लिए क्या-क्या तैयारियां की गईं? कितना बजट कहां खर्च हुआ? लेकिन, अधिकारियों ने कोई जवाब देना उचित नहीं समझा। बतनेरा राहत शिविर में शरणार्थी बने ग्रामीण हेतमापुर में जिन परिवारों के घर नदी की धार में पूरी तरह बह चुके हैं। वे इस समय गांव से करीब 2 किलोमीटर दूर बतनेरा के बाढ़ राहत शिविर में शरण लेने को मजबूर हैं। रामनगर तहसील के तहसीलदार विपुल सिंह के अनुसार- करीब 30 परिवार सीधे तौर पर बेघर हुए हैं। 50 से ज्यादा मकानों पर कटान का खतरा है। प्रशासन की ओर से नियमानुसार आपदा राहत कोष से आर्थिक सहायता और खाद्य सामग्री बांटी गई है। सबसे बड़ी चुनौती बेघर परिवारों को स्थायी रूप से बसाने की है। इसके लिए ‘लालपुर करौता’ क्षेत्र के पास सरकारी जमीन चिह्नित की जा रही है। जैसे ही जमीन का आवंटन फाइनल होगा, सभी प्रभावित परिवारों को पट्टे देकर वहां स्थायी रूप से बसाया जाएगा। ———————————————- ये ग्राउंड रिपोर्ट भी पढ़ें… मिर्जापुर का खंडहर स्कूल अब कॉन्वेंट को दे रहा टक्कर, पहले 50 से कम बच्चे, अब AI-कंप्यूटर की पढ़ाई स्मार्ट क्लासरूम में डिजिटल स्क्रीन पर बच्चे समझ रहे कि AI यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस काम कैसे करता है। कंप्यूटर के सामने बैठे बच्चों के कानों पर हेडफोन और मुंह पर माइक। क्लास की दीवारों पर सिलेबस को समझाने वाली पेंटिंग। बाहर कैंपस में हर तरफ हरियाली। मिर्जापुर का ये सरकारी स्कूल कॉन्वेंट स्कूलों को टक्कर दे रहा है। पूरी खबर पढे़ं…
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25 घर बाढ़ में बहे, मस्जिद नदी में लटकी:बाराबंकी में 18 साल बाद सरयू ने बदला रास्ता; लोग बोले- उम्मीद टूटती जा रही