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गोंडा के कौड़िया बाजार स्थित जय सम्मय माता पैड़ीबरा में आयोजित नौ दिवसीय श्रीराम कथा के चौथे दिन पूज्य राजन जी महाराज ने प्रभु श्रीराम की बाल लीलाओं का मनोहारी संगीतमय वर्णन किया। कथा के दौरान उन्होंने “राजा जी खजनवा दे दा, रानी जी गहनवा दे द…” जैसे सोहर प्रस्तुत किए, जिस पर श्रद्धालु झूम उठे। महाराज राजन जी ने कहा कि मनुष्य जिस व्यक्ति या विचार का लगातार चिंतन करता है, उसका प्रभाव उसके स्वभाव में उतरने लगता है। यदि कोई दुष्टता का चिंतन करेगा तो उसके भीतर दुष्ट प्रवृत्तियां बढ़ेंगी, जबकि संतों और सद्गुणों का चिंतन व्यक्ति को साधुता की ओर ले जाता है। उन्होंने भगवान श्रीराम के अनुज शत्रुघ्न का उदाहरण देते हुए कहा कि वे रामचरितमानस के मौन पात्र हैं और जो व्यक्ति मौन रहने की कला सीख लेता है, उसके शत्रु स्वतः समाप्त होने लगते हैं। देखिए 3 तस्वीरें… बड़ा आदमी वह नहीं जिसके पास अपार धन-संपत्ति उन्होंने लोगों से आत्मचिंतन करने का आह्वान करते हुए कहा कि हर व्यक्ति को यह सोचना चाहिए कि उसके जाने के बाद किसी घर या समाज का वातावरण कैसा होता है। महाराज जी ने कहा कि बड़ा आदमी वह नहीं जिसके पास अपार धन-संपत्ति हो, बल्कि बड़ा वह है जिसके आने से घर में दीपावली जैसा आनंद छा जाए। कथा के दौरान उन्होंने कहा कि व्यक्ति से बड़ा उसका व्यक्तित्व होता है। व्यक्ति नश्वर है, लेकिन उसका व्यक्तित्व सदैव जीवित रहता है। उन्होंने बताया कि भगवान श्रीराम के जन्म के बाद अयोध्या में उत्सव का वातावरण बन गया था और पूरी नगरी आनंद एवं पवित्रता से भर उठी थी। मनुष्य अपनी बुरी आदतों को सुधार ले नामकरण संस्कार का प्रसंग सुनाते हुए महाराज जी ने कहा कि गुरु वशिष्ठ ने श्रीराम को आनंदस्वरूप, भरत को प्रेम की मूर्ति, लक्ष्मण को सेवा का प्रतीक और शत्रुघ्न को मौन का स्वरूप बताया था। उन्होंने कहा कि जीवन का वास्तविक आनंद वह है जिसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता, उसे केवल अनुभव किया जा सकता है। राजन जी महाराज ने कहा कि भगवान का भजन करना कठिन नहीं है। यदि मनुष्य अपनी बुरी आदतों को सुधार ले, मन की चंचलता पर नियंत्रण कर ले और व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन लाए, वही सच्चा भजन है। उन्होंने कहा कि जब मन, कर्म और वचन से चतुराई समाप्त हो जाती है तो जीवन सरल हो जाता है और भगवान की प्राप्ति का मार्ग खुलता है। बिना सत्संग के विवेक संभव नहीं उन्होंने विद्यालयों में केवल शिक्षा ही नहीं, बल्कि संस्कार और विवेक की शिक्षा देने पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि बिना सत्संग के विवेक संभव नहीं है और सत्संग का अवसर भी उसी को मिलता है जिस पर भगवान की विशेष कृपा होती है। कथा के दौरान महाराज जी ने मुनि विश्वामित्र के अयोध्या आगमन, राजा दशरथ द्वारा उनके आतिथ्य-सत्कार, श्रीराम के चूड़ाकर्म, नामकरण और यज्ञोपवीत संस्कार का भावपूर्ण वर्णन किया, जिसे सुनकर श्रद्धालु भावविभोर हो गए। इस अवसर पर दद्दन मिश्र, जिला अध्यक्ष अकबाल बहादुर तिवारी, भवानी भीख शुक्ल, राकेश पांडेय, राजेश तिवारी, मसूद आलम खां, रामभजन चौबे, महेश नारायण तिवारी, अंकित शुक्ल सहित बड़ी संख्या में गणमान्य लोग मौजूद रहे। आयोजकों के अनुसार कथा में प्रतिदिन लगभग 10 हजार श्रद्धालु शामिल हो रहे हैं।
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व्यक्ति से बड़ा उसका व्यक्तित्व होता है- राजन जी महाराज:बोले- जिस मनुष्य को मौन होने का ढंग आ गया, उसके शत्रु अपने आप समाप्त हो जाएंगे