वकीलों के आपराधिक गठजोड़ तोड़ने के निर्देश:हाईकोर्ट ने कहा- वकीलों पर दर्ज केस की सुनवाई दूसरे जिले में हो, एफआईआर करें


इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश की कानूनी व्यवस्था को सुधारने और वकीलों के आपराधिक गठजोड़ को तोड़ने के लिए निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि जिन वकीलों के खिलाफ गंभीर और जघन्य अपराधों (7 वर्ष से अधिक सजा वाले मामले) के मुकदमे दर्ज हैं, उनके मामलों की सुनवाई उनके गृह जिले की बजाय किसी दूसरे नजदीकी जिले की अदालत में की जाए। यह आदेश न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने मोहम्मद कफील की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है। कोर्ट ने आदेश में टिप्पणी की है कि कानून दो बार मरता है—एक बार तब जब उसके अधिकारी अपराधी बन जाते हैं और दूसरी बार तब जब न्यायाधीश न्यायिक साहस दिखाने की बजाय चुप्पी साध लेते हैं। दोनों ही मामलों में, कानून का शासन पहला शिकार होता है। हाईकोर्ट ने वकीलों कार्यशैली पर उठाए सवाल कोर्ट ने राज्य सरकार, पुलिस और यूपी बार कौंसिल द्वारा पेश किए गए आंकड़ों का विश्लेषण करने के बाद पाया कि उत्तर प्रदेश में 4,157 वकील कुल 5,056 आपराधिक मामलों में नामजद हैं। इनमें से 418 वकील ऐसे हैं जिन पर तीन या उससे अधिक मामले दर्ज हैं, और कुछ पर तो 46 तक एफआईआर दर्ज हैं।
कोर्ट ने कहा कि कई जिला न्यायालयों में लॉ ग्रेजुएट्स के संगठित गिरोह बन गए हैं, जो कोर्ट के फैसलों को जबरन लागू कराने, अवैध रूप से कब्जे खाली कराने और गवाहों व वादियों को डराने-धमकाने का काम कर रहे हैं। स्थानीय स्तर पर अपने प्रभाव के कारण ये निष्पक्ष सुनवाई में बाधा डालते हैं, इसलिए इनके मुकदमों को दूसरे जिले में ट्रांसफर करना अनिवार्य हो गया है। जानिये कोर्ट ने क्या कहा हाईकोर्ट ने इस व्यवस्था को सुचारू रूप से लागू करने के लिए पांच साल के पायलट प्रोजेक्ट के तहत छह की कोर्ट में की जाए 1- वकीलों के खिलाफ चल रहे गंभीर आपराधिक मामलों को उनके गृह जिले की अदालतों से हटाकर दूसरे जिले में ट्रांसफर किया जाएगा। ​2- ट्रांसफर किया जाने वाला जिला वकील के गृह जिले से 100 किमी से अधिक दूर नहीं होना चाहिए ताकि गवाहों या वादियों को परेशानी न हो। ​3- ट्रांसफर किए गए मामलों की सुनवाई नए जिले के जिला जज की देखरेख में एक निर्दिष्ट अदालत करेगी। ​4- अदालतों पर बोझ न बढ़े, इसके लिए अदलाबदली की व्यवस्था की गई है (जैसे जिला ए के मामले जिला बी में और जिला बी के मामले जिला ए में जाएंगे)। ​5- वैवाहिक और पारिवारिक विवादों से जुड़े मुकदमों को इस ट्रांसफर प्रक्रिया से बाहर रखा गया है। ​6- यदि कोई इस ट्रांसफर प्रक्रिया में बाधा डालता है, तो मूल जिला अदालत को अवमानना की कार्रवाई शुरू करने का अधिकार होगा। ​हाईकोर्ट ने इसके लिए प्रदेश के सभी 74 क्रियाशील जिला न्यायालयों की एक सूची भी जारी की है। उदाहरण के लिए— प्रयागराज के वकीलों के मामले प्रतापगढ़ में, लखनऊ के मामले बाराबंकी में, और कानपुर नगर के मामले उन्नाव में सुने जाएंगे। ​फर्जी डिग्री वाले 105 वकीलों पर एफआईआर के निर्देश ​सुनवाई के दौरान यूपी बार कौंसिल की जांच में राज्य भर में 105 वकील फर्जी शैक्षणिक प्रमाणपत्रों (एलएलबी, ग्रेजुएशन आदि) के आधार पर प्रैक्टिस करते पाए गए। कोर्ट ने बार कौंसिल को फटकार लगाते हुए कहा कि पांच लाख से अधिक वकीलों की सूची में सिर्फ 105 फर्जी वकील मिलना ऊंट के मुंह में जीरा जैसा है और यह जांच महज औपचारिकता लगती है।
कोर्ट ने बार कौंसिल को आदेश दिया कि इन सभी 105 फर्जी वकीलों के खिलाफ धोखाधड़ी और जालसाजी की धाराओं में 30 दिन के भीतर एफआईआर दर्ज कराई जाए। कोर्ट ने बार कौंसिल को निर्देश दिया कि जिन वकीलों के खिलाफ जघन्य अपराधों में चार्जशीट दाखिल हो चुकी है, उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की जाए और जांच लंबित रहने तक उनका लाइसेंस सस्पेंड किया जाए। साथ ही विष्य में वकीलों के पंजीकरण के समय पुलिस वेरिफिकेशन और डिजीलॉकर/यूनिवर्सिटी के माध्यम से डिजिटल डिग्री वेरिफिकेशन को अनिवार्य बनाने की सिफारिश की है। अफसर बैठक कर रिपोर्ट दें ​कोर्ट ने प्रत्येक जिला जज, डीएम व एसएसपी/एसपी को हर महीने बैठक करके आदेश के अनुपालन की समीक्षा करने और रिपोर्ट हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार को भेजने का निर्देश भी दिया है। ​कोर्ट ने अपने फैसले के अंत में महाभारत का संदर्भ देते हुए गंभीर टिप्पणी की। कहा कि जब द्रौपदी का चीरहरण हो रहा था, तब राजा धृतराष्ट्र अपने पुत्रमोह में मूक दर्शक बने बैठे रहे। प्राधिकारियों की ऐसी निष्क्रियता भी अपराध जितनी ही दोषी है। यह महाकाव्य हमें याद दिलाता है कि जब सत्ता में बैठे लोग अन्याय पर चुप रहते हैं, तो उसकी कीमत केवल पापी को ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी चुकानी पड़ती है। मामले की अगली सुनवाई 20 अगस्त को अनुपालन रिपोर्ट देखने के लिए होगी।

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