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लखनऊ में शनिवार को ‘लखनऊ बायोस्कोप’, ‘सनतकदा’ और ‘नेमतखाना’ ने मिलकर ‘लुत्फ़-ए-लखनऊ’ कार्यक्रम का आयोजन किया। कैसरबाग स्थित लखनऊ बायोस्कोप में आयोजित इस सांस्कृतिक संध्या में मुहर्रम से जुड़ी साहित्य, संगीत, धार्मिक परंपराओं और खान-पान की समृद्ध विरासत को एक मंच पर प्रस्तुत किया गया। इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में कला और संस्कृति प्रेमियों ने भाग लिया। शाम का मुख्य आकर्षण ‘सोज़ ख़्वानी का फ़न’ रहा। कलाकार अस्करी नक़वी ने सोज़ ख़्वानी की परंपरा, उसके इतिहास और सांस्कृतिक महत्व पर विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि सोज़ ख़्वानी मुहर्रम के दौरान पढ़ी जाने वाली शोकपूर्ण काव्य पाठ की एक विशेष शैली है, जो श्रद्धा, संवेदना और आध्यात्मिक भावनाओं को व्यक्त करती है।
सोज ख्वानी भारतीय शास्त्रीय रागों पर आधारित है नक़वी ने आगे बताया कि सोज़ ख़्वानी भारतीय शास्त्रीय रागों पर आधारित है और यह अवध की संगीत परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह गायन नहीं, बल्कि एक विशेष शैली में किया जाने वाला पाठ है। उनके अनुसार, गंगा-जमुनी तहज़ीब की पहचान है और इसकी प्रस्तुति में भजनों जैसी कई समानताएं भी देखी जा सकती हैं। कार्यक्रम के दूसरे सत्र में ‘अवधी होम कुक्ड फेस्टिवल’ का आयोजन किया गया। होम शेफ़ शीबा इक़बाल की देखरेख में मुहर्रम की मजलिसों में बनने वाले पारंपरिक व्यंजन परोसे गए। शहर के विभिन्न होम शेफ़्स ने इन व्यंजनों को अपने परिवारों में पीढ़ियों से चली आ रही पारंपरिक रेसिपी के आधार पर तैयार किया था। फूड फेस्टिवल में पारंपरिक व्यंजन आकर्षण रहा फूड फेस्टिवल में खिचड़ा, शीरमाल के साथ सब्ज़ कबाब, खमीरी रोटी के साथ आलू का सालन, चावल के साथ खड़ी मसूर की दाल, मजलिसी कबाब और आलू गोश्त जैसे पारंपरिक व्यंजन आकर्षण का केंद्र रहे। इस कार्यक्रम ने अवध की साझा सांस्कृतिक विरासत, गंगा-जमुनी तहज़ीब और पारंपरिक खान-पान को नई पीढ़ी के सामने जीवंत रूप में प्रस्तुत किया।
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लुत्फ-ए-लखनऊ कार्यक्रम में मुहर्रम की विरासत प्रस्तुत:साहित्य, संगीत और खानपान की परंपराओं को मिला मंच