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लखनऊ में शनिवार को रात्रि एक बजे मातम हुआ । मोहर्रम के 25 वे होने वाले इस मातम में बड़ी संख्या में शिया समुदाय के लोग काले कपड़े पहन कर शामिल हुए। दरगाह हजरत अब्बास में आयोजित हुए इस मातम में हजारों की संख्या में अकीदतमंदों ने हिस्सा लिया। मातम से पहले मजलिस पढ़ी गई। इस मातम का आयोजन अंजुमन पासदाराने कर्बला के द्वारा किया गया। 2 महीना 8 दिनों तक है मातम – मजलिस आयोजकों में शामिल सय्यद नेहाल मेहंदी ने बताया कि इस मातम को 500 लोग एक साथ मिल कर नोहे की धुन पर करते हैं। मातम से पहले सभी लड़कों को इसके लिए विशेष रूप से तैयार किया जाता है। 2 महीना 8 दिनों तक मुहर्रम मनाया जाता है। इस दौरान कर्बला की जंग में शहीद होने वाले अलग-अलग लोगों की याद में मातम और मजलिस का आयोजन होता है। दुर्रे वाले मातम का अकीदतमंदों को इंतजार रहता है नेहाल ने बताया कि पैगंबर मोहम्मद साहब के नवासे हजरत इमाम हुसैन के साथ जो 72 लोग शहीद हुए थे। उन सभी को याद किया जाता है। दुर्रे वाला मातम बिल्कुल अलग होता है, जो पूरे शहर में सिर्फ एक ही अंजुमन करती है। हजरत इमाम हुसैन के बेटे बीमार जैनुल आबेदीन, जिन्हें हजरत इमाम जैनुल आबेदीन भी कहा जाता है, शिया मुसलमानों के चौथे इमाम थे। कर्बला की लड़ाई में जीवित बचे थे क्योंकि वे बीमार थे। उनकी याद में ये मातम होता है। नंगे पांव काले लिबास में किया मातम सिर पर या हुसैन की पट्टी, नंगे पांव काले कपड़ों में 500 लोग लोहे की जंजीरों से बने दुर्रे से मातम करते हुए ‘या सज्जाद या हुसैन’ की सदा बुलंद की। लगभग 2 घंटे तक तमाम अजादार नम आंखों से मातम करते रहे। इस दौरान बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चे भी शामिल हुए। नम आंखों से कर्बला वालों की शहादत को याद करके उन्हें सलाम पेश किया। नोहे की धुन पर मातम नोहे की धुन पर 500 युवा एक साथ बिल्कुल सधे हुए अंदाज में मातम किया। आयोजकों ने बताया कि इस मातम से पहले इन सभी युवाओं को विशेष रूप से तैयार किया जाता है। इमाम हुसैन और उनके साथ शहीद हुए सभी लोगों की याद में मातम करते हुए पूर्सा ( शोक संवेदना) पेश करते हैं।
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लखनऊ में 25 मोहर्रम को हुआ दुर्रे वाला मातम हुआ:नम आंखों से हजरत जैनुल आबेदीन को याद किया , 500 युवाओं ने एक साथ एक लय में किया मातम