रामगंगा की बदहाली पर बरसे बरेली के प्रबुद्ध जन:करोड़ों रुपए बहाने के बाद भी नहीं सुधरी रामगंगा की जमीनी हकीकत, विश्व पर्यावरण दिवस पर रामगंगा की सुध


आज विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर दैनिक भास्कर की टीम बरेली की जीवनदायिनी रामगंगा नदी के तट पर पहुंची। रामगंगा नदी जिससे लाखों लोगों की आस्था जुड़ी हुई है, आज अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रही है। नदी का पानी बेहद गंदा और प्रदूषित नजर आ रहा है। पर्यावरण दिवस के इस विशेष अवसर पर जब हमारी टीम ने एक नाव के जरिए नदी के बीच का रुख किया, तो वहां का नजारा बेहद चिंताजनक था। इस मौके पर शहर के कुछ प्रबुद्ध नागरिकों, पत्रकारों और कवियों ने रामगंगा की स्थिति पर गहरा दुख और आक्रोश व्यक्त किया। नदियों से सिर्फ लिया, बदले में कुछ नहीं दिया
रामगंगा के घाट पर मौजूद वरिष्ठ पत्रकार डॉ. पवन सक्सेना ने नदी की इस हालत पर चिंता जाहिर करते हुए कहा कि रामगंगा के नाम में ही भगवान राम और गंगा मैया दोनों का वास है। हम लोग आज यहां गंगा आरती के लिए आए थे, लेकिन जब नाव से नदी के बीच में पहुंचे तो पानी में भारी गंदगी देखने को मिली। उन्होंने कहा कि मानव सभ्यता के विकास के साथ ही हमने नदियों से हमेशा कुछ न कुछ लिया ही है, लेकिन बदले में उन्हें कभी कुछ वापस नहीं दिया। रामगंगा हमारी मां के समान है और आज पर्यावरण दिवस पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि अगली बार जब हम यहां आएं, तो यह पानी पूरी तरह से साफ और स्वच्छ हो। इसके लिए हम सभी को मिलकर प्रयास करने होंगे। कागजों में नहीं, धरातल पर काम करने की जरूरत
नदी के बीच नाव के सफर के दौरान हमारे साथ मौजूद जाने-माने कवि रोहित राकेश ने फिल्मी अंदाज में अपनी बात रखी। उन्होंने राज कपूर की मशहूर फिल्म का जिक्र करते हुए कहा कि ‘राम तेरी गंगा मैली हो गई’ फिल्म की जो हकीकत है, उसे आज वो अपनी आंखों से साक्षात देख रहे हैं। उन्होंने अपनी पंक्तियों के जरिए दर्द बयां करते हुए कहा कि चेहरा-चेहरा है मक्कारी, गंगा तेरा क्या होगा, पत्थर हल्के फूल हैं भारी, गंगा तेरा क्या होगा। उन्होंने आगे कहा कि गंगा और रामगंगा की स्वच्छता को लेकर बडी-बड़ी बातें और आरतियां तो बहुत होती हैं, लेकिन कहीं न कहीं इसमें एक बहुत बड़ा झूठ छुपा हुआ है। रामगंगा को साफ करने का काम केवल कागजों पर नहीं, बल्कि धरातल पर होना चाहिए, जो फिलहाल होता हुआ नहीं दिख रहा है। हजारों करोड़ खर्च करने के बाद भी हाथ लगी निराशा
शहर के नागरिक मुकेश तिवारी ने भी प्रशासनिक दावों की पोल खोलते हुए अपना गुस्सा जाहिर किया। उन्होंने कहा कि आज विश्व पर्यावरण दिवस पर चारों तरफ बड़े-बड़े आयोजन हो रहे हैं, लेकिन रामगंगा की जमीनी हकीकत देखकर मन बेहद निराश होता है। नमामि गंगे और नदी स्वच्छता के नाम पर अब तक हजारों करोड़ रुपए पानी की तरह बहाए जा चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद यहां के घाट बेहद गंदे हैं और पानी पूरी तरह से दूषित हो चुका है। सरकार और प्रशासन के तमाम दावों के बाद भी हकीकत में जमीन पर कुछ भी बदलाव नजर नहीं आ रहा है, जो कि बेहद चिंता का विषय है।

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