दो वकीलों का लाइसेंस निरस्त करने का निर्देश:हाईकोर्ट ने कहा-धोखाधड़ी कर प्राप्त आदेश रद्द, वसूली की जाए


इलाहाबाद हाईकोर्ट में बरेली विकास प्राधिकरण की एक पुनर्विलोकन अर्जी की सुनवाई के दौरान विपक्षी वकीलों द्वारा अदालत के साथ धोखाधड़ी करने का खुलासा हुआ।
जिसपर कोर्ट ने कडा रूख अपनाया है।उन वकीलों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का निर्देश दिया है। बरेली का है मामला यह मामला बरेली के दोहनिया गांव की भूमि (खसरा नं. 135) के अधिग्रहण से जुड़ा है, जो बरेली विकास प्राधिकरण ने विकास कार्य के लिए अधिग्रहीत की थी। भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 के तहत शुरू हुई प्रक्रिया का अवार्ड 26 अप्रैल 2016 को नए भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 के तहत घोषित हुआ। रामपाल व अन्य विपक्षियों ने भुगतान में देरी के लिए ब्याज के लिए याचिका दाखिल की थी। मूल अवार्ड में केवल “नियमानुसार ब्याज देय होगा” लिखा था, जबकि याचिका के साथ संलग्न टाइप की गई प्रति में जानबूझकर जोड़ दिया गया कि पहले वर्ष 9 फीसदी और उसके बाद 15 फीसदी वार्षिक ब्याज देय होगा , जो मूल अवार्ड में कहीं नहीं था। इसी छेड़छाड़ की गई प्रति पर भरोसा करते हुए कोर्ट ने 24 मई 2024 को प्राधिकरण को इस ब्याज दर से भुगतान करने का आदेश दे दिया। जब प्राधिकरण ने रिकॉर्ड जांचे तो धोखाधड़ी सामने आई और उसने आदेश के पुनर्विलोकन के लिए अर्जी दाखिल की। लेकिन इस बीच प्रतिवादियों ने अवमानना याचिका दाखिल कर प्राधिकरण पर दबाव बनाया, जिसके चलते प्राधिकरण ने विवादित दर पर भुगतान कर दिया। जजों ने वकीलों की माफी ठुकराई न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने वकीलों के द्वारा मांगी गई माफी को ठुकराते हुए कहा कि यह टाइपिंग की गलती नहीं बल्कि जानबूझकर की गई बेईमानी थी। कोर्ट ने कहा कि सच्चा पश्चाताप अलग चीज़ है और पकड़े जाने के डर से मांगी गई माफी अलग। यह माफी केवल इसलिए आई क्योंकि झूठ पकड़ा गया। अदालत ने वकालत के पेशे की गरिमा पर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि आम नागरिक मजबूरी में वकीलों के पास जाता है और उन पर पूरा भरोसा करता है; ऐसे में यदि दोषियों को हल्के में छोड़ा गया तो बार में गलत संदेश जाएगा। कोर्ट ने 24 मई 2024 का अपना आदेश रद्द कर दिया, क्योंकि वह धोखाधड़ी से हासिल किया गया था। प्राधिकरण को निर्देश दिया गया कि जिन लाभार्थियों को गलत दर पर भुगतान हुआ, उनसेठ यह राशि राजस्व बकाया के रूप में वसूल करने की कार्रवाई तुरंत शुरू करे। रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया गया कि वे धारा 340 दंड प्रक्रिया संहिता के तहत जांच कर संबंधित मजिस्ट्रेट कोर्ट में भारतीय दंड संहिता क धारा 199 (झूठा साक्ष्य गढ़ना, धारा 193 के तहत दंडनीय) के तहत शिकायत दर्ज कराएं। रजिस्ट्रार जनरल को यह भी निर्देश दिया गया कि वे बार काउंसिल ऑफ इंडिया और उत्तर प्रदेश स्टेट बार काउंसिल में इन वकीलों (शिव कांत मिश्रा व कृष्ण कांत मिश्रा) का लाइसेंस रद्द करने के लिए शिकायत भेजें। जिन अन्य मामलों में इस रद्द किए गए आदेश का हवाला दिया गया है, वहां भी यह निर्णय संबंधित कोर्ट के समक्ष रखा जाएगा। 66 दिन की देरी से दाखिल समीक्षा याचिका को भी कोर्ट ने परिस्थितियों को देखते हुए स्वीकार कर लिया।

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