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‘तारीख पर तारीख’ का दौर जब सिस्टम की लापरवाही से जुड़ जाए, तो इंसाफ की आस भी दम तोड़ने लगती है। बुलंदशहर की अदालत से आया एक फैसला पूरे न्यायिक और अभियोजन तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। जिस मुकदमे में वादी खुद एक न्यायिक मजिस्ट्रेट थे और कटघरे में वकील, उसका अंतिम फैसला आने में पूरे 34 साल (12,368 दिन) लग गए। अपर सिविल जज (अवर खंड) मोनिका कालरा की अदालत ने साक्ष्यों के अभाव में आरोपी अधिवक्ता प्रेमशंकर चौहान और वेदपाल राघव को बाइज्जत बरी कर दिया। वहीं, तीसरे आरोपी वकील विजय राघव की फैसला आने से पहले ही मृत्यु हो चुकी है। क्या था मामला? यह मामला 24 जून 1992 का है। खुर्जा न्यायालय में तैनात तत्कालीन मुंसिफ अशोक कुमार वर्मा ने खुर्जा नगर थाने में तहरीर दी थी। आरोप था कि तीनों वकीलों ने कोर्ट रूम में घुसकर अभद्रता की, पत्रावली फाड़ी और चैंबर में जाकर मारपीट व जान से मारने की धमकी दी। अभियोजन की नाकामी गंभीर आरोपों के बावजूद पुलिस और सरकारी अभियोजन तंत्र 34 वर्षों में अदालत के समक्ष मात्र एक गवाह प्रस्तुत कर सका। हद तो तब हो गई जब वह अकेला गवाह भी अदालत में अपने बयानों से मुकर गया। वर्ष 2004 में आरोप तय होने के बाद से फाइल गवाही के इंतजार में धूल फांकती रही। अदालत ने 17 सितंबर 2026 को कड़ा रुख अपनाते हुए डीएम, एसएसपी और संयुक्त निदेशक अभियोजन को सख्त चेतावनी भरा पत्र भी भेजा, लेकिन तंत्र की कुंभकर्णी नींद नहीं टूटी। अंततः कोर्ट ने संदेह का लाभ देते हुए आरोपियों को बरी कर दिया। दोनों पक्षों के लिए मुसीबत यह लंबा इंतजार दोनों पक्षों के लिए त्रासदी साबित हुआ। वादी न्यायिक अधिकारी 34 साल तक इंसाफ के लिए भटकते रहे, जबकि आरोपी अधिवक्ताओं को अपनी आधी उम्र सिर पर लगे कलंक को धोने में गंवानी पड़ी। एक वकील बेगुनाही का फैसला सुने बिना ही इस दुनिया से चले गए। अधिवक्ताओं ने इस पूरी देरी के लिए पुलिस और अभियोजन तंत्र की कार्यप्रणाली को जिम्मेदार ठहराया है।
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तारीख पर तारीख में निकल गए 34 साल:जज वादी और वकील आरोपी; कोर्ट का फैसला 34 साल बाद आया; सबूतों के अभाव में दोनों आरोपी बरी