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चित्रकूट में स्थित महाराजाधिराज मत्यगजेंद्रनाथ मंदिर सावन के महीने में श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का केंद्र है। मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सीमा पर मंदाकिनी नदी के तट पर स्थित यह मंदिर अपनी अनूठी धार्मिक परंपरा के लिए जाना जाता है। मान्यता है कि भगवान श्रीराम ने वनवास के छठवें दिन यहीं प्रथम पाषाण शिवलिंग की स्थापना कर भगवान शिव की पूजा की थी। इसके लगभग 14 वर्ष बाद, लंका विजय से पहले, उन्होंने रामेश्वरम में रामलिंगम और विश्वलिंगम की स्थापना की थी। मत्यगजेंद्रनाथ मंदिर का गर्भगृह इसकी सबसे बड़ी विशेषता है, जहाँ एक ही स्थान पर चार अलग-अलग स्वतंत्र शिवलिंग चतुर्लिंग स्वरूप में विराजमान हैं। ये शिवलिंग न तो चतुर्मुखी हैं और न ही चार दिशाओं में स्थापित हैं। विशिष्ट व्यवस्था के कारण दुर्लभ तीर्थ पुरोहितों के अनुसार, ये चारों शिवलिंग क्रमशः सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर और कलियुग का प्रतिनिधित्व करते हैं, और इनके आकार भी इसी क्रम में भिन्न हैं। देश में ऐसे कुछ ही मंदिर हैं जहाँ एक ही पीठ पर चार स्वतंत्र शिवलिंग स्थापित हैं, लेकिन चित्रकूट का यह स्वरूप अपनी विशिष्ट व्यवस्था के कारण दुर्लभ माना जाता है। शिव महापुराण की रुद्र संहिता के अनुसार, सतयुग में ब्रह्माजी ने चित्रकूट में सर्वदेव यज्ञ का आयोजन किया था। यज्ञ की रक्षा के लिए भगवान शिव ऐरावत हाथी के समान दिव्य स्वरूप में प्रकट हुए, जिन्हें ब्रह्माजी ने लिंग रूप में प्रतिष्ठित कर चित्रकूट का महाराजाधिराज घोषित किया। त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने इसी गर्भगृह में दूसरा शिवलिंग स्थापित कर प्रतिदिन पूजा-अर्चना की। तीसरे शिवलिंग की स्थापना महर्षि अत्रि ने की थी, जबकि चौथे शिवलिंग की स्थापना 17वीं शताब्दी में रीवा नरेश महाराजा भावसिंह ने कराई थी। श्रद्धालुओं के लिए दर्शन प्रारंभ मंदिर के पट प्रतिदिन ब्रह्ममुहूर्त में सुबह 3:30 बजे खुलते हैं और सुबह 4 बजे से श्रद्धालुओं के लिए दर्शन प्रारंभ हो जाते हैं। दोपहर में भोग के समय आधे घंटे के लिए पट बंद रहते हैं, जबकि शाम 4 बजे तक जलाभिषेक की अनुमति होती है। पंचामृत अभिषेक, शृंगार आरती और रात्रि शयन आरती के बाद रात 10 बजे मंदिर के पट बंद कर दिए जाते हैं। सावन के अंतिम सोमवार और महाशिवरात्रि पर यहाँ निकलने वाली शिव बारात और विशेष आयोजन हजारों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बनते हैं।
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चित्रकूट में चार युगों के चार शिवलिंग:श्रीराम ने रामेश्वरम से पहले की थी प्रथम स्थापना