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इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ग्राम पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त किए जाने के मामले में संवैधानिक प्रश्नों पर सुनवाई करेगी। इस मामले की अगली सुनवाई 4 अगस्त को निर्धारित की गई है। न्यायालय ने कहा है कि वह यह भी देखेगा कि समय पर चुनाव न करा पाने में सरकार की विफलता रही है अथवा नहीं। न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने यह आदेश पारित किया। पीठ ने उत्तर प्रदेश पंचायती राज अधिनियम की धारा 12(3-ए) की वैधता पर विचार किए जाने की आवश्यकता बताई। न्यायालय ने एक पुराने मामले का भी जिक्र किया। वर्ष 2000 में प्रेम लाल पटेल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में हाईकोर्ट ने इसी प्रकार के प्रावधान को संविधान के अनुच्छेद 243-ई और 243-के के विपरीत मानते हुए असंवैधानिक ठहराया था। हालांकि, बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने उस मामले में कानून के प्रश्नों को खुला छोड़ते हुए अपील का निस्तारण कर दिया था। संजय कुमार शर्मा की ओर से दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए पीठ ने कहा कि यह विचारणीय है कि ग्राम प्रधान को प्रशासक नियुक्त करने से क्या पंचायत का कार्यकाल अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ता है। साथ ही, क्या इससे राज्य निर्वाचन आयोग के संवैधानिक अधिकार प्रभावित होते हैं, इस पर भी विचार किया जाएगा।
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ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाने पर लखनऊ हाईकोर्ट करेगा सुनवाई:संवैधानिक सवालों पर 4 अगस्त को अगली तारीख