Political Digital Campaign | Influencers And Content Creators Power

3 मिनट पहले

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राजनीतिक दलों की ताकत का पुराना आधार संगठन और कार्यकर्ता रहे हैं। अब इनके समानांतर कंटेंट क्रिएटर्स और माइक्रो इंफ्लूएंसर्स की ‘डिजिटल फौज’ खड़ी हो रही है। इनके पास न पार्टी का पद है, न झंडा। लेकिन, हजारों-लाखों स्क्रीन तक पहुंच है।

युवा आंदोलनों ने इसकी ताकत दिखा दी है। आंदोलन की सूचना, नैरेटिव और सरकार से सवाल अब सिर्फ सभा, पोस्टर या प्रेस कॉन्फ्रेंस के भरोसे नहीं हैं। एक रील, मीम या शॉर्ट वीडियो कुछ घंटों में लाखों युवाओं तक पहुंच सकता है।

यूपी, पंजाब और उत्तराखंड के विधानसभा चुनाव से पहले पार्टियां 10 से 50 हजार फॉलोअर्स वाले स्थानीय इंफ्लूएंसर्स का नेटवर्क बनाने में जुटी हैं। डिजिटल कैंपेन से जुड़े लोगों के अनुसार, छोटे और मझोले इंफ्लूएंसर किसी दल से स्थायी रूप से नहीं जुड़ते। वे अलग-अलग समय पर भाजपा, कांग्रेस, आप या अन्य दलों के लिए काम कर सकते हैं।

50 लाख से ज्यादा सब्सक्राइबर, तो 30 लाख रुपए मिलते हैं

राजनीतिक रील के 15 से 50 हजार रु. और पोस्ट के 15 से 20 हजार रु. तक दिए जाने के दावे हैं। सोशल मीडिया कंपनी चलाने वाले श्याम तिवारी के अनुसार, 5 लाख तक सब्सक्राइबर वाले क्रिएटर 50 हजार से एक लाख रुपए तक लेते हैं। 50 लाख से ज्यादा सब्सक्राइबर वाले बड़े क्रिएटर का एक कंटेंट 30 लाख रुपए तक पहुंच सकता है।

स्थानीय असर ज्यादा अहम, सरकारों ने बना दिए रेट कार्ड

पार्टियां क्रिएटर की सामाजिक पहुंच, विचारधारा और बॉडी लैंग्वेज तक परखती हैं। 15 हजार फॉलोअर्स वाला शिक्षक, किसान, कॉमेडियन कहीं-कहीं राष्ट्रीय सेलिब्रिटी से ज्यादा प्रभावी हो सकता है। त्वरित नैरेटिव के लिए इंस्टाग्राम इंफ्लूएंसर और नेता की छवि गढ़ने के लिए पॉडकास्ट का इस्तेमाल किया जा रहा है।

राजनीतिक पेमेंट नकद में चलने के दावे हैं। चुनाव आयोग सोशल मीडिया राजनीतिक विज्ञापन और चुनावी खर्च को नियमन के दायरे में रखता है। एएससीआई गाइडलाइंस भी विज्ञापन की स्पष्ट सूचना देने को कहती हैं।

पर, कोई शिक्षक शिक्षा नीति की तारीफ करे तो दर्शक कैसे पहचाने कि यह पेड प्रचार है। 2027 के दौरान होने वाले चुनाव में वोटर के सामने ये चुनौती रहेगी।

क्रिएटर के पास रीच, कार्यकर्ता के पास बूथ

कांग्रेस की जेन-जी कनेक्ट यात्रा से जुड़े सुधांशु वाजपेयी कहते हैं, ‘रील्स से कार्यकर्ता से ज्यादा फेम मिल सकता है। पर, वोटर को बूथ तक लाना कार्यकर्ता का ही काम है।’ सोनम वांगचुक के लद्दाख अभियान ने दिखाया कि डिजिटल समर्थन जमीन पर उतर सकता है।

2024 की भूख हड़ताल के बाद कम से कम 50 शहरों में ‘फ्रेंड्स ऑफ लद्दाख’ कार्यक्रम हुए। पर जरूरी नहीं कि हर वायरल अभियान वोट में बदले। ‘जागो कर्नाटक’ के संयोजक नूर श्रीधर भी सोशल मीडिया और बूथ-स्तरीय प्रबंधन के तालमेल को निर्णायक मानते हैं।

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