China India Relations; Xi Jinping BRICS 2026 Diplomacy Explained | Delhi Beijing Trade

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग 7 साल बाद भारत पहुंचे हैं। वो BRICS समिट के अलावा पीएम मोदी के साथ द्विपक्षीय बैठक भी करेंगे। जिनपिंग आखिरी बार अक्टूबर 2019 में अनौपचारिक बैठक के लिए भारत आए थे।

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1. डिप्लोमेसी: कारोबारी मजबूरी में भारत-चीन का सियासी तनाव कम होगा

  • जून 2020 में गलवान घाटी में भारतीय और चीनी सेनाओं के बीच खूनी झड़प हुई। भारत के कैप्टन संतोष बाबू समेत 20 जवान शहीद हुए। हालात इतने बिगड़े कि दोनों ओर से फॉरवर्ड पोस्ट पर जवानों और हथियारों की भारी तैनाती की गई।
  • 4 साल बाद अक्टूबर 2024 में दोनों देशों के रिश्तों में कुछ नरमी आई। सीमा पर डिसइंगेजमेंट हुआ। रूस के कजान में मोदी-जिनपिंग की बातचीत हुई।
  • अगस्त 2025 में मोदी SCO समिट के लिए चीन गए और जिनपिंग से मिले। हाल ही में किर्गिस्तान में भी दोनों नेताओं ने हैंडशेक किया। अब जिनपिंग भारत आ रहे हैं और मोदी के साथ बातचीत की मेज पर बैठेंगे। ये लगातार तीसरा साल है जब दोनों नेता मिल रहे हैं।
अगस्त 2025 में चीन के तियानजिन में पीएम मोदी और राष्ट्रपति जिनपिंग ने बातचीत की थी। तब जिनपिंग ने कहा था कि हमें प्रतिद्वंद्वी के बजाय साझेदार बनना चाहिए।

अगस्त 2025 में चीन के तियानजिन में पीएम मोदी और राष्ट्रपति जिनपिंग ने बातचीत की थी। तब जिनपिंग ने कहा था कि हमें प्रतिद्वंद्वी के बजाय साझेदार बनना चाहिए।

  • ब्रिटिश थिंकटैंक चैथम हाउस के एशिया-पैसेफिक प्रोग्राम के सीनियर रिसर्च फेलो डॉ. चिएतिज बाजपेयी मानते हैं कि भारत-चीन के बीच यह स्ट्रैटेजिक रीसेट नहीं, बल्कि टैक्टिकल थॉ है। यानी रिश्तों में जमा बर्फ भले कुछ पिघली है, लेकिन सीमा विवाद और पाकिस्तान-चीन के रिश्ते को लेकर तनाव बना हुआ है।
  • डिप्लोमेसी में टैक्टिकल थॉ का मतलब होता है- आर्थिक जरूरतों के चलते 2 प्रतिद्वंद्वी देशों में राजनीतिक और सैन्य तनाव का अस्थायी तौर पर कम होना।

2. ऑप्टिक्स: जिनपिंग, पुतिन और मोदी एक साथ दिखना भी बड़ी बात

  • पिछले डेढ़ साल में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प की पॉलिसी का सीधा असर भारत, रूस और चीन पर पड़ा है। ट्रम्प ने भारत पर कुल 50% टैरिफ लगाया, जो सीरिया और म्यांमार जैसे देशों के बराबर था। वहीं चीन पर 145% तक टैरिफ और रूस पर कई तरह की आर्थिक और सैन्य पाबंदियां लगाईं।
  • 1 सितंबर 2025 को चीन के तियानजिन में हुई SCO समिट के दौरान पीएम मोदी, पुतिन और जिनपिंग की साथ वाली तस्वीरें वायरल हुईं। पूरी दुनिया में चर्चा शुरू हुई कि क्या भारत-रूस-चीन एक मेज पर आ गए हैं।
  • ट्रम्प की सोशल मीडिया पोस्ट से उनकी नाराजगी भी दिखी। उन्होंने ट्रुथ सोशल पर तीनों नेताओं की फोटो शेयर करते हुए लिखा, ‘ऐसा लगता है कि हमने भारत और रूस को चीन के हाथों खो दिया। उम्मीद करता हूं कि उनकी साझेदारी लंबी और समृद्ध हो।’
  • पिछले महीने किर्गिस्तान के बिश्केक में हुई SCO समिट के दौरान दोबारा ऐसी तस्वीरें आईं, जिन्हें फिर से अमेरिका और पश्चिमी देशों के खिलाफ देखा गया।
  • ऐसे में फिर से तीनों नेताओं का साथ आना, ऑप्टिक्स के लिहाज से काफी अहम होगा। इससे वॉशिंगटन को मैसेज जाएगा कि भारत के पास अमेरिका ही इकलौता विकल्प नहीं है। वहीं बीजिंग भी दिखाएगा कि पश्चिमी दुनिया ने भले ही उसे अलग-थलग करने की कोशिश की, लेकिन वो ग्लोबल स्टेज पर अकेला नहीं है, खासकर उस मंच पर है, जहां भारत और रूस भी हैं।
दिल्ली में हो रही BRICS समिट के दौरान राष्ट्रपति पुतिन, पीएम मोदी और और राष्ट्रपति जिनपिंग।

दिल्ली में हो रही BRICS समिट के दौरान राष्ट्रपति पुतिन, पीएम मोदी और और राष्ट्रपति जिनपिंग।

3. मैसेजिंग: BRICS कोई दिखावे का मंच नहीं, सभी देश एकजुट

  • BRICS अब सिर्फ 5 देशों- ब्राजील, रूस, भारत, चीन और साउथ अफ्रीका का ग्रुप नहीं रहा। इसमें ईरान, UAE, सऊदी अरब जैसे 6 और देश जुड़ चुके हैं, यानी कुल 11 ताकतें।
  • इन देशों में दुनिया की आधी आबादी रहती है और ग्लोबल GDP में इनकी 40% हिस्सेदारी है। दूसरी तरफ ग्लोबल ऑर्डर में उठापटक मची है। ट्रम्प मनमाने फैसले ले रहे हैं। दुनिया 25 युद्धों की मार झेल रही है। तेल-गैस, अनाज, कच्चे माल जैसी जरूरी चीजों की ग्लोबल सप्लाई चेन प्रभावित रही है।
2006 में BRICS की शुरुआती मीटिंग हुई, जिसमें भारत, चीन, रूस और ब्राजील के नेता शामिल हुए। बाद में इसमें साउथ अफ्रीका जुड़ा। तस्वीर- 2016 में भारत में हुए BRICS समिट की है।

2006 में BRICS की शुरुआती मीटिंग हुई, जिसमें भारत, चीन, रूस और ब्राजील के नेता शामिल हुए। बाद में इसमें साउथ अफ्रीका जुड़ा। तस्वीर- 2016 में भारत में हुए BRICS समिट की है।

  • BRICS की अहमियत तब और बढ़ जाती है, जब 100 से ज्यादा देशों वाले ग्लोबल साउथ के ज्यादातर देश इससे उम्मीदें रखते हैं और मानते हैं कि BRICS पश्चिमी देशों के मुकाबले एक मजबूत मंच साबित होगा।
  • हालांकि अलग-अलग सोच वाले BRICS के सभी 11 सदस्य देशों को एकजुट बनाए रखना आसान नहीं है। इनमें लोकतांत्रिक भारत है, तो सत्तावादी चीन-रूस भी हैं। ईरान का UAE और सऊदी अरब से संघर्ष जारी है। इथियोपिया और इजिप्ट भी आपस में विरोधी हैं। BRICS को एकजुट और कामयाब बनाए रखने की सबसे बड़ी शर्त है कि भारत और चीन आपस में खुले टकराव से बचें।
  • भारतीय थिंकटैंक ऑर्गनाइजेशन फॉर रिसर्च ऑन चाइना एंड एशिया की डायरेक्टर ईरिशिका पंकज मानती हैं कि इस बार की BRICS समिट जितनी नई दिल्ली के लिए अहम है, उतनी ही बीजिंग के लिए। क्योंकि अगले साल वो BRICS का मेजबान है। अगर जिनपिंग मौजूदा चेयर, यानी भारत नहीं आते, तो चीन की ही साख को नुकसान पहुंचता।

भारत और चीन के रिश्ते करवट ले रहे हैं, लेकिन 2 वजहों से फिलहाल दोनों देश एक पाले में नहीं आ सकते। पहला- ट्रस्ट डेफिसिट, यानी भरोसे की कमी और दूसरा- ट्रेड डेफिसिट, यानी व्यापार घाटा।

पहली चुनौती: भारत-चीन के बीच भरोसे की कमी

  • 1962 में दोनों देश जंग लड़ चुके हैं। सीमा विवाद के चलते 2013 में लद्दाख के देपसांग, 2014 में चुमार, 2017 में डोकलाम और 2020 में पूर्वी लद्दाख के गलवान में दोनों सेनाओं के बीच झड़पें हो चुकी हैं। अभी भी LAC पर करीब 50,000 भारतीय जवान तैनात हैं। जून 2026 में अरुणाचल प्रदेश की जनजातियों ने दावा किया है कि चीनी सेना उनकी पुश्तैनी जमीन पर कब्जा कर रही है। हालांकि भारत ने इसका खंडन किया।
  • चीन ने माना कि मई 2025 में भारत-पाकिस्तान के बीच हुए टकराव में उसने पाकिस्तान की मदद की। चीन-पाकिस्तान लगातार स्ट्रैटजिक पार्टनरशिप भी बढ़ा रहे हैं। भारत का एक और पड़ोसी बांग्लादेश भी चीनी खेमे में जा रहा है।
  • ग्लोबल अफेयर्स के एक्सपर्ट डॉ. डायलन लोह मानते हैं कि भारत-चीन का बातचीत की मेज पर आना रिस्क मैनेजमेंट है, न कि कोई स्ट्रैटेजिक रीसेट। दोनों के बीच सीमा विवाद और एक-दूसरे की विदेश नीति के कारण अविश्वास की इतनी गहरी खाई है, जिसे भरने में लंबा वक्त लग सकता है। अगर दोनों के रिश्ते सुधारने हैं, तो उन्हें कई मुद्दों पर पीछे हटना पड़ेगा, जो शायद ही हो।

दूसरी चुनौती: भारत को चीन से कारोबारी घाटा

  • 2025-26 में दोनों देशों के बीच 151 अरब डॉलर का कारोबार हुआ। इसमें से 132 अरब डॉलर का सामान भारत ने चीन से खरीदा, जबकि बेचा सिर्फ 19 अरब डॉलर का। यानी भारत को करीब 112 अरब डॉलर का घाटा हुआ, जो ऑल-टाइम हाई है।
  • भारत आज भी लौह अयस्क, नेफ्था और मसालों जैसी कच्ची चीजें चीन को बेचता है, जबकि उससे इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, बैटरी और सोलर कंपोनेंट्स जैसे हाई-वैल्यू प्रोडक्ट खरीदता है।
  • भारत की इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रिक व्हीकल, सोलर एनर्जी, फार्मास्युटिकल, टेलीकॉम जैसी इंडस्ट्रीज चीनी कच्चे माल, मशीनरी और कंपोनेंट्स पर निर्भर हैं।
  • भारत-चीन पॉलिसी एक्सपर्ट डॉ. श्रीपर्णा पाठक मानती हैं कि चीन के साथ 100 अरब डॉलर से ज्यादा का कारोबार घाटा भारत की सप्लाई चेन और इंडस्ट्रीज के लिए खतरा है। इसके चलते भारत स्ट्रैटेजिक मोर्चों पर सीमित हो जाता है। वहीं चीन चाहता है कि सीमा विवाद को अलग रखकर केवल कारोबार बढ़ाया जाए, जो भारत नहीं चाहता है।

जिनपिंग की भारत यात्रा से पहले NSA अजीत डोभाल चीन गए थे। रिपोर्ट्स के मुताबिक उस दौरे में दोनों देशों के बीच कई बिंदुओं पर सहमति बनी थी। मसलन- सीमा विवाद पर बातचीत आगे बढ़ाना, सैन्य हॉटलाइन मजबूत करना, वीजा नियमों में ढील और व्यापार से जुड़े मुद्दे। यानी टेबल पहले से तैयार है।

सूत्रों के मुताबिक, जिनपिंग से द्विपक्षीय बातचीत में नई दिल्ली की टॉप प्रयॉरिटी आपसी सहयोग, कारोबार, पीपल-टू-पीपल एक्सचेंज और सीमा विवाद हैं। जिनपिंग के दौरे से ठीक पहले चाइना सदर्न एयरलाइंस ने 6 साल बाद ग्वांगझू-दिल्ली रूट पर फ्लाइट सर्विस बहाल कर दी है।

जियोस्ट्रैटजी एक्सपर्ट मनोज केवलरामानी के मुताबिक, ‘भारत-चीन की बातचीत में बीच कारोबार और निवेश जैसे मुद्दों पर फ्रेमवर्क बनने की उम्मीद है। वीजा नियमों में ढील भी मिल सकती है। लेकिन सीमा विवाद पर कुछ ठोस होता नहीं दिखता।’

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