सेंट्रल मार्केट मुद्दे पर मेरठ बंद से पीछे हटे संगठन:संयुक्त व्यापार संघ के दोनों गुटों ने वापस लिया समर्थन, 44 भूखंड मालिक भी अलग हुए


मेरठ के शास्त्रीनगर स्थित सेंट्रल मार्केट के सेटबैक प्रकरण को लेकर 2 सितंबर को प्रस्तावित मेरठ बंद अब संघर्ष समिति के अध्यक्ष रविंद्र गुर्जर के लिए मुश्किलों भरा होता दिखाई दे रहा है। बंद के समर्थन में जुटाए जा रहे व्यापारिक और सामाजिक संगठनों में से कई प्रमुख संगठन अब पीछे हट गए हैं। संयुक्त व्यापार संघ के दोनों गुटों ने भी बंद को जरूरी नहीं बताते हुए अपना समर्थन वापस लेने का ऐलान किया है। इसके साथ ही जो 44 भूखंड जो आवास विकास ने डीसील किए गए थे उन्होंने भी समर्थन वापस ले लिया है। रविंद्र गुर्जर के नेतृत्व में पिछले कई दिनों से शहर के अलग-अलग बाजारों में जनसंपर्क अभियान चलाकर व्यापारियों से बंद के समर्थन की अपील की जा रही थी। इसके साथ ही बार एसोसिएशन, किसान संगठनों और अन्य व्यापारिक संगठनों को भी आंदोलन से जोड़ने का प्रयास किया गया। कुछ संगठनों ने समर्थन का ऐलान भी किया था, लेकिन अब समर्थन वापसी के बाद आंदोलन का दायरा सीमित होता नजर आ रहा है। संयुक्त व्यापार संघ के अध्यक्ष नवीन गुप्ता और अजय गुप्ता की ओर से कहा गया कि प्रशासन और शासन स्तर से व्यापारियों तथा आवासीय लोगों की समस्याओं के समाधान का आश्वासन दिया गया है। ऐसे में 2 सितंबर को मेरठ बंद की जरूरत नहीं है। राजनीतिक रंग देने की भी चर्चा बंद को लेकर शहर के व्यापारिक हलकों में अब इसे राजनीतिक दृष्टिकोण से भी जोड़कर देखा जा रहा है। व्यापारियों के एक वर्ग का मानना है कि जिस मुद्दे को लेकर आंदोलन शुरू हुआ था, उसमें प्रशासनिक स्तर पर बातचीत और समाधान की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। ऐसे में बंद का नेतृत्व एक व्यक्ति तक सीमित रहना आंदोलन की स्वीकार्यता पर सवाल खड़े कर रहा है। वहीं, रविंद्र गुर्जर लगातार कह रहे हैं कि जब तक व्यापारियों और आवासीय लोगों को ठोस राहत नहीं मिलती, संघर्ष जारी रहेगा। उन्होंने 2 सितंबर के बंद को लेकर जनसंपर्क अभियान जारी रखा है। सेंट्रल मार्केट से भी नहीं समर्थन इसके साथ ही जिन 44 भूखंडों को आवास विकास द्वारा डी सील किया गया था पहले उन्होंने भी रविंद्र गुर्जर के इस आंदोलन में समर्थन की घोषणा की थी लेकिन आज आवास विकास कार्यालय में हुई मीटिंग के बाद 44 भूखंडों के स्वामियों ने मेरठ बंद होने के इस आंदोलन से अपना समर्थन वापस ले लिया है । इसके साथ ही ईडब्ल्यूएस और एलआईजी अपना समर्थन इस बंदी से वापस ले लिया है।
वहीं नर्सिग होम एसोसिएशन के लीगल एडवाइजर डॉ नागेंद्र ने एक वीडियो जारी करते हुए कहा कि रविंद्र गुर्जर को हमारे द्वारा ही एक जिम्मेदारी दी गई थी जिसमें उन्हें भाषा की मर्यादा रखना बहुत जरूरी है। जिस प्रकार की भाषा का इस्तेमाल उन्होंने मेरठ के मुख्य चिकित्सा अधिकारी के लिए की है वह बेहद शर्मनाक है यदि रविंद्र गुर्जर उसके लिए वीडियो जारी कर सार्वजनिक रूप से माफी नहीं मांगते हैं तो डॉक्टर भी इस बंदी में कोई समर्थन नहीं देंगे। सीएमओ ने बहाल किया लाइसेंस सीएमओ डॉ राम प्रसाद ने शास्त्री नगर के जिला अस्पतालों को लाइसेंस निलंबित करने के नोटिस दिए थे उनको फिर से बहाल कर दिया गया है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट से इस पर भी कार्रवाई की जा सकती है क्योंकि 25 अक्टूबर 2025 के बाद जब कमिश्नर के साथ बनाई गई एक समिति गठित कर ध्वस्तीकरण रोक दिया गया था उसपर भी सुप्रीम कोर्ट ने जवाब तलब किया था ऐसे में इस पर भी अब यही अनुमान है। क्यों अकेले हुए रविंद्र गुर्जर दरअसल रविंद्र गुर्जर के इस लड़ाई में अकेले पढ़ने का सबसे अहम कारण यह है कि लगभग 4 महीने से यह आंदोलन अपने चरम पर है जिसमें सेक्टर दो और सेक्टर 4 में महिलाओं का धरना चल रहा है। इसके साथ ही इस दौरान कई बार बाजार बंद हुए और आवास विकास के कार्यालय पर प्रदर्शन हुए और यहां तक की लोग जेल भी गए । इस बीच रविंद्र गुर्जर की कोई प्रतिक्रिया कभी भी सामने नहीं आई। हाल ही में हुई सुनवाई के बाद जब आवास विकास द्वारा 21 अस्पतालों को नोटिस दिए तो उसमें रविंद्र गुर्जर के जगदंबा हॉस्पिटल को भी नोटिस मिला, उसके बाद वह सक्रिय हुए। वहीं कुछ दिन पहले जब उन्होंने एक प्रदर्शन आवास विकास कार्यालय पर किया था तब भी सेक्टर 2 में धरने पर बैठी महिलाएं उनके समर्थन में नहीं पहुंची थी और उन्होंने यही सवाल उठाया था। हालांकि इसके बाद सभी व्यापारियों ने एकजुट होने की बात कहते हुए निर्णय लिया था कि अब यह लड़ाई सभी एक साथ आकर लड़ेंगे जिसके मुखिया रविंद्र गुर्जर रहेंगे। इसके साथ-साथ दूसरा अहम कारण जो बताया जा रहा है वह है कि कुछ विशेषज्ञ का कहना है कि आने वाले समय में रविंद्र गुर्जर दक्षिण विधानसभा से चुनाव भी लड़ सकते हैं ऐसे में यह भी एक कारण बताया जा रहा है कि लोग इस लड़ाई में उनसे नहीं जुड़ रहे हैं । मुख्य रूप से दक्षिण विधानसभा के कुछ गांव और गुर्जर समाज के लोग ही इस आंदोलन में ज्यादातर बच गए हैं इसके अलावा कुछ ही लोग हैं जो इस बंदी के पक्ष में अन्यथा लगातार इस बंदी में जिन लोगों द्वारा समर्थन दिया गया था वह वापस ले रहे हैं।

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