प्रयागराज दो दिनों की बारिश में क्यों हुआ पानी-पानी?:रिकॉर्ड बारिश संग जिम्मेदारों की लापरवाही, प्लानिंग के साथ नाला सफाई व्यवस्था भी सवालों में


संगमनगरी में महाकुंभ के दौरान करीब सात हजार करोड़ रुपये के विकास कार्य हुए। सड़कें चौड़ी हुईं, नालों और सीवर लाइनों को दुरुस्त करने के दावे किए गए, शहर को नए रूप में सजाया गया। लेकिन दो दिनों की बारिश ने इन तमाम दावों की पोल खोल दी। शहर की सड़कें और गलियां तालाब में तब्दील हो गईं, कई घरों में पानी घुस गया और सोमवार को जमा हुआ पानी मंगलवार तक भी नहीं निकल सका।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर कुछ घंटों की तेज बारिश में प्रयागराज का ड्रेनेज सिस्टम क्यों चरमरा गया? पड़ताल में पांच बड़ी वजहें सामने आती हैं। इनमें रिकॉर्ड बारिश के साथ जलनिकासी की कमजोर प्लानिंग, पुराने ड्रेनेज सिस्टम से छेड़छाड़, इंजीनियरिंग की खामियां और नाला सफाई की मॉनिटरिंग पर उठ रहे सवाल शामिल हैं।
1. दो दिनों में करीब एक महीने के औसत के बराबर बारिश
मौसम विभाग के आंकड़ों के मुताबिक प्रयागराज में जुलाई और अगस्त बारिश के लिहाज से सबसे महत्वपूर्ण महीने हैं। सीजन के दौरान एक महीने में औसतन करीब 250 से 320 मिलीमीटर बारिश होती है।
इस बार महज दो दिनों में ही करीब 205 मिलीमीटर बारिश रिकॉर्ड हुई। रविवार से सोमवार दोपहर तक 24 घंटे में करीब 90 मिलीमीटर और सोमवार दोपहर से मंगलवार दोपहर तक 115 मिलीमीटर बारिश हुई।
यानी दो दिनों में जितनी बारिश सामान्य तौर पर एक महीने के आसपास में होती है, उसका बड़ा हिस्सा बरस गया। एक जून से 18 अगस्त तक प्रयागराज में कुल करीब 522 मिलीमीटर बारिश दर्ज की जा चुकी है।
रिकॉर्ड बारिश निश्चित तौर पर जलभराव की बड़ी वजह है, लेकिन सवाल यह है कि शहर का ड्रेनेज सिस्टम इतनी बारिश के बाद पूरी तरह बेबस क्यों हो गया?
2. महाकुंभ के विकास कार्यों में ड्रेनेज की प्लानिंग पर सवाल
पूर्व आईएएस और प्रयागराज के पूर्व मंडलायुक्त बादल चटर्जी के मुताबिक महाकुंभ के दौरान सड़क चौड़ीकरण और सौंदर्यीकरण के काम में कई जगह पुराने खुले नालों को बंद कर दिया गया।
उनका कहना है कि सड़क किनारे पानी की निकासी के लिए छोटी-छोटी जालियां और कनेक्टर बनाए गए, लेकिन सतही पानी की निकासी के लिए इनकी क्षमता पर्याप्त नहीं है। तेज बारिश में जब बड़ी मात्रा में पानी सड़क पर आया तो यह व्यवस्था उसे तेजी से नालों तक नहीं पहुंचा सकी।
यानी शहर को सुंदर बनाने के साथ जलनिकासी की मूल जरूरत को लेकर पर्याप्त दूरदर्शिता नहीं बरती गई।
3. पुराने बड़े नालों पर कब्जे से ड्रेनेज नेटवर्क ध्वस्त
पूर्व मंडलायुक्त बादल चटर्जी के मुताबिक अंग्रेजों के समय सिविल लाइंस, जार्जटाउन समेत शहर के कई हिस्सों में बड़े नाले बनाए गए थे। इनका पानी कंपनी गार्डन क्षेत्र में बनाए गए रिजर्वायर तक पहुंचता था। यहां जमा पानी का इस्तेमाल सिंचाई के लिए भी किया जाता था।
इन नालों की जमीन नजूल की थी और पट्टा दिए जाने के समय भी यह शर्त रहती थी कि जलनिकासी के इन रास्तों से छेड़छाड़ नहीं की जाएगी। लेकिन बाद में जमीनों के फ्रीहोल्ड होने के बाद कई जगह इन पुराने जलनिकासी मार्गों पर निर्माण और प्लॉटिंग होने के आरोप हैं।
इसका सीधा असर शहर की जलनिकासी व्यवस्था पर पड़ा। जो बड़े नाले भारी बारिश का पानी तेजी से बाहर निकाल सकते थे, उनमें से कई या तो संकरे हो गए या उनका अस्तित्व ही खत्म हो गया।
4. सड़कें ऊंची हुईं, घर नीचे रह गए, इंजीनियरिंग पर सवाल
शहर के कई पुराने मोहल्लों में सड़कें लगातार ऊंची होती गईं, जबकि आसपास के मकान अपेक्षाकृत नीचे रह गए। जार्जटाउन और टैगोरटाउन जैसे इलाकों में यह समस्या साफ दिखाई देती है।
जानकारों का कहना है कि सड़क निर्माण के दौरान केवल सड़क की ऊंचाई और मजबूती पर ध्यान देने के बजाय यह भी देखना जरूरी है कि बारिश का पानी किस दिशा में बहेगा और उसे नाले तक पहुंचने में कितना समय लगेगा।
कई स्थानों पर सड़क से नाले तक पानी के प्राकृतिक बहाव में बाधा है। ऐसे में तेज बारिश होते ही सड़कें पानी का कटोरा बन जाती हैं और आसपास के घरों में पानी घुसने लगता है।
5. नाला सफाई की व्यवस्था अचानक बदली, रवैये पर सवाल
वरिष्ठ पार्षद कमलेश तिवारी नगर निगम की नाला सफाई व्यवस्था पर सवाल उठाते हैं। उनका आरोप है कि पहले अलग-अलग नालों की सफाई के लिए अलग टेंडर होते थे और पार्षदों की निगरानी में काम कराया जाता था। इस बार शहर के सभी नालों की सफाई का काम एक ही एजेंसी को दिया गया।
आरोप है कि एजेंसी ने आगे पेटी कांट्रैक्टरों के जरिए काम कराया और प्रभावी मॉनिटरिंग नहीं होने से सफाई के नाम पर खानापूर्ति हुई।
नाला सफाई पर करीब 12 करोड़ रुपये खर्च किए जाने का दावा किया गया, लेकिन दो दिनों की बारिश के बाद शहर के हालात ने सफाई व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल यह है कि यदि नालों की सफाई वास्तव में प्रभावी ढंग से हुई थी तो इतनी बड़ी मात्रा में पानी जमा क्यों हुआ?
पूर्व पार्षद मुकुंद तिवारी के मुताबिक शहर में लगातार निर्माण हो रहे हैं, लेकिन इसके अनुरूप ड्रेनेज सिस्टम को अपग्रेड नहीं किया गया। उनका आरोप है कि महाकुंभ और उसके बाद माघ मेले से पहले जल्दबाजी में कई जगह सीवर लाइनें बिछाई गईं। कुछ लाइनों में पर्याप्त क्षमता वाले पाइप नहीं लगाए गए। ऐसे में बारिश के दौरान सीवर और ड्रेनेज सिस्टम पर दबाव बढ़ते ही व्यवस्था जवाब दे गई।
हाईकोर्ट ने क्यों लिया स्वत: संज्ञान?
दो दिनों की बारिश के बाद प्रयागराज के कई मोहल्लों में हालात बदतर हो गए। सड़कें और गलियां पानी में डूब गईं, घरों में पानी घुसा और बड़ी संख्या में लोग प्रभावित हुए। शहर के उन इलाकों में भी जलभराव हुआ जहां बड़ी संख्या में अधिवक्ता रहते हैं।
मंगलवार को बार की ओर से ‘नो एडवर्स’ की निवेदन किया गया। इसी बीच शहर में जलभराव और आम लोगों की परेशानी को देखते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मामले का स्वत: संज्ञान लिया और संबंधित अधिकारियों को तलब किया।
अब सुनवाई में यह सवाल भी अहम होगा कि शहर की जलनिकासी व्यवस्था की जिम्मेदारी किन विभागों की है, पिछले वर्षों में इसके लिए कितना पैसा खर्च हुआ और उसके बावजूद दो दिनों की बारिश में शहर की ऐसी स्थिति क्यों बनी।

Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *