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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने एक निर्णय में कहा कि रिटायरमेंट के बाद एकेडमिक सेशन के आखिर तक नौकरी जारी रखना एक रियायत है, न कि कोई कानूनी अधिकार।
इसका दावा सिर्फ़ वही टीचर कर सकता है जो असल में रेगुलर टीचिंग (नियमित शिक्षण) में लगा हो। कोर्ट ने कहा कि एक एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर, जिन्हें रिसर्च काम का इंचार्ज बनाया गया था, वह सिर्फ़ इसलिए इस फ़ायदे का दावा नहीं कर सकते कि वे एक टीचिंग पोस्ट पर बने रहे और उसके बदले सैलरी लेते रहे। जानिये क्या है मामला जस्टिस मंजू रानी चौहान ने डां अवधेश कुमार तिवारी की याचिका की याचिका खारिज करते हुए कहा, “कानून बनाने वालों की मंशा, लागू कानून और एग्जीक्यूटिव पॉलिसी को अगर सही ढंग से समझा जाए तो साफ़ पता चलता है कि एकेडमिक सेशन के आखिर तक एक्सटेंशन का मकसद सिर्फ़ पढ़ाई-लिखाई को लगातार जारी रखना और चल रहे सेशन के बीच में रुकावट से छात्रों के हितों की रक्षा करना है।
इसका मकसद संस्थागत है, न कि व्यक्तिगत। यह न तो लंबी सेवा के लिए कोई इनाम है और न ही मुख्य नियुक्ति का कोई हिस्सा। यह फ़ायदा उन हालात पर निर्भर करता है जो इसे देने को सही ठहराते हैं, यानी यह कि संबंधित व्यक्ति असल में रेगुलर टीचिंग में लगा हो, ताकि एकेडमिक सेशन के बीच में काम रुकने से पढ़ाई-लिखाई की प्रक्रिया पर बुरा असर न पड़े।” याचिका में किया गया चैलेंज याचिकाकर्ता को 9 दिसंबर 2017 को बांदा यूनिवर्सिटी ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड टेक्नोलॉजी, बांदा में एसोसिएट प्रोफेसर (एग्रोनॉमी) के तौर पर नियुक्त किया गया। इस यूनिवर्सिटी के अपने कोई नियम-कानून नहीं हैं। इसने चंद्रशेखर आज़ाद यूनिवर्सिटी ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड टेक्नोलॉजी, कानपुर के नियमों को अपनाया है। उन्होंने दिसंबर 2017 और अक्टूबर 2019 के बीच अंडरग्रेजुएट और पोस्ट-ग्रेजुएट कोर्स पढ़ाए। 21 अक्टूबर 2019 के आदेश से उनका ट्रांसफर मिलट्स रिसर्च स्टेशन, गुरसराय, झांसी (जो अब इस नाम से जाना जाता है) में कर दिया गया और उन्हें एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर बने रहते हुए सेंटर का इंचार्ज बना दिया गया।
याचिकाकर्ता, जिनकी जन्म तिथि 10 जुलाई 1964 है, को 30 जून 2026 के एक पत्र के ज़रिए सूचित किया गया कि वह 31 जुलाई 2026 से रिटायर हो जाएंगे। सेशन के अंत तक काम जारी रखने के लिए उनकी अर्जियों पर कोई जवाब न मिलने पर उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर की, जिसका निपटारा सक्षम अधिकारी को 72 घंटों के भीतर दावे पर निर्णय लेने के निर्देश के साथ किया गया। दावे को 15 जुलाई 2026 के आदेश द्वारा खारिज कर दिया गया और मौजूदा याचिका में दोनों आदेशों को चुनौती दी गई। अदालत ने पाया कि विवाद रिटायरमेंट की उम्र के बारे में नहीं, बल्कि उसके बाद भी काम जारी रखने के बारे में था, जिसे सामान्य सेवा कार्यकाल के बराबर नहीं माना जा सकता और न ही इसे कोई पक्का कानूनी अधिकार माना जा सकता है। अदालत ने देखा कि याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर पाए कि उन्हें नियमित रूप से क्लास में पढ़ाने का काम सौंपा गया, या उन्होंने रिटायरमेंट से ठीक पहले वाले सेशन में अंडरग्रेजुएट या पोस्ट-ग्रेजुएट कोर्स पढ़ाए, या उनके रिटायरमेंट से किसी टीचिंग प्रोग्राम में कोई रुकावट आएगी। अदालत दलीलों पर उठाए सवाल अदालत ने कहा, “एसोसिएट प्रोफेसर के मुख्य पद पर बने रहना या उस पद के लिए वेतन लेना, अपने आप में सेशन बेनिफिट देने के लिए ज़रूरी शर्तों को पूरा नहीं करता है।” उत्तर प्रदेश कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय अधिनियम, 1958 की धारा 2(क) के तहत ‘टीचर’ (शिक्षक) को ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया गया, जिसे यूनिवर्सिटी ने पढ़ाने या रिसर्च या एक्सटेंशन प्रोग्राम चलाने और उनका मार्गदर्शन करने के लिए नियुक्त या मान्यता दी हो, और इसमें वह व्यक्ति भी शामिल है जिसे कानूनों के तहत टीचर घोषित किया गया हो। 14 जून 2022 के सरकारी आदेश में यह प्रावधान है कि अधिनियम के तहत नियुक्त टीचर, जो उस परिभाषा के दायरे में आते हैं और कानूनों के अध्याय 12 की धारा 28-डी और अध्याय 13 के क्लॉज 4-डी के अनुसार नियुक्त किए गए, वे 62 साल की उम्र तक सेवा में बने रह सकते हैं और उन्हें एकेडमिक सेशन के अंत तक, यानी रिटायरमेंट के बाद आने वाली 30 जून तक सेवा विस्तार का अधिकार भी है। कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी नोट किया कि फुल बेंच ने माना था कि मुख्य रूप से रिसर्च के काम में लगे कर्मचारी को सिर्फ़ इसलिए इस पॉलिसी का फ़ायदा नहीं मिल सकता कि वह किसी एजुकेशनल इंस्टिट्यूशन से जुड़ा है। यह देखते हुए कि सक्षम अधिकारी ने दर्ज किया था कि याचिकाकर्ता रेगुलर टीचिंग में शामिल नहीं था, कोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया गया, जिससे यह साबित हो सके कि यह निष्कर्ष गलत, दुर्भावनापूर्ण , मनमाना या स्पष्ट रूप से गैर-कानूनी था। साथ ही रिट अधिकार क्षेत्र के तहत कोर्ट ऐसे तथ्यात्मक आकलन पर अपनी राय नहीं थोप सकती। कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर पाया कि डॉ. वीरेंद्र कुमार सिंह की ड्यूटी और स्थिति एक जैसी है। साथ ही किसी दूसरे मामले में दिया गया फ़ायदा अपने आप में कानूनी अधिकार का आधार नहीं बन सकता। यह मानते हुए कि विवादित आदेशों में न तो अधिकार क्षेत्र की कोई गलती थी और न ही एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी से जुड़े कानूनी प्रावधानों का कोई उल्लंघन हुआ था, कोर्ट ने याचिका खारिज की।
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रिटायरमेंट पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला:कोर्ट ने कहा एकेडमिक सेशन में हक रिसर्च ड्यूटी पर तैनात टीचर को नहीं