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इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने हमीरपुर जिले के बुल्डोजर कार्रवाई व पाक्सो के एक बहुचर्चित मामले में जजों में मतभिन्नता के कारण तीसरे जज से सुनवाई के लिए केस रेफर कर दिया है।
न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने फैमुद्दीन एवं अन्य की याचिका पर यह आदेश दिया, जिसमें संपत्ति सील करने और ध्वस्तीकरण की आशंका को लेकर संवैधानिक संरक्षण मांगा गया था। याचिकाकर्ताओं ने क्या कहा जानिए
याचियों का कहना था कि उनकी रिश्तेदार आफान खान के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धाराओं 64(1), 62/351(3), 61(2), आईटी एक्ट की धारा 67, पॉक्सो एक्ट की धारा 3/4 और उत्तर प्रदेश गैरकानूनी धर्मांतरण निषेध अधिनियम के तहत केस दर्ज है। आरोप है कि आफान खान का याचिकाकर्ताओं की संपत्तियों आवासीय मकान, “इंडियन लॉज” नामक व्यावसायिक प्रतिष्ठान और आरा मिल में कोई स्वामित्व नहीं है, फिर भी बिना नोटिस या सुनवाई के इन संपत्तियों को सील करने और ध्वस्त करने की कार्रवाई की जा रही है, जिसे उन्होंने “सामूहिक दंड” और भीड़तंत्र जैसी राजनीतिक रूप से संरक्षित कार्रवाई बताया। सरकारी वकीलों ने कहा तथ्य छिपाए गए राज्य सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त मुख्य स्थायी अधिवक्ता प्रियंका मिड्ढा ने अदालत को बताया कि याचिका में तथ्य छिपाए गए हैं। उन्होंने बताया कि “इंडियन लॉज” सिंचाई विभाग की जमीन पर बना है और 2021 की एक जनहित याचिका में पहले से ही अतिक्रमण हटाने के आदेश हैं। पुलिस पक्ष ने बताया कि 16 वर्षीय एक नाबालिग पीड़िता के साथ बलात्कार, आपत्तिजनक वीडियो बनाने, ब्लैकमेल करने और धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाने का गंभीर आरोप है, और इसी लॉज में यह घटना हुई बताई गई। जांच में याचिकाकर्ता फैमुद्दीन की भूमिका भी सामने आई और उसे गिरफ्तार कर जेल भेजा जा चुका है। आरा मिल पर वन विभाग के तहत अलग से कार्रवाई चल रही है, क्योंकि वहां संरक्षित प्रजाति की लकड़ी बरामद हुई थी। जजों की राय को जानिए
न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन ने सुप्रीम कोर्ट के “बुलडोजर जजमेंट” (इन रि: डायरेक्शंस इन द मैटर ऑफ डिमॉलिशन ऑफ स्ट्रक्चर्स) का हवाला देते हुए यह व्यवस्था दी कि किसी आरोपी के घर को केवल इसलिए ध्वस्त करना कि उस पर आपराधिक मामला दर्ज है, “प्रतिशोधात्मक कार्यकारी विवेकाधिकार” माना जाएगा। उन्होंने निर्देश दिया कि एफआईआर दर्ज होने की तारीख से दो वर्ष तक किसी आरोपी का घर ध्वस्त न किया जाए, जब तक कि सार्वजनिक भूमि पुनः प्राप्त करने की तत्काल आवश्यकता न हो और कार्रवाई केवल आरोपी के घर तक सीमित न हो। साथ ही यह भी जोड़ा कि यदि कोई व्यक्ति तीन वर्ष या उससे अधिक समय से अवैध निर्माण में रह रहा है, तो प्राधिकरण को नगरीय कानून के तहत कार्रवाई शुरू करने से एक वर्ष पहले सूचना देनी होगी, ताकि वह वैकल्पिक व्यवस्था कर सके। साथी न्यायाधीश के फैसले से असहमति
न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन ने अपने साथी न्यायाधीश के फैसले से आंशिक असहमति जताते हुए कहा कि अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट को “दो साल” जैसी कोई निश्चित समय-सीमा तय करने का अधिकार नहीं है, क्योंकि इससे कानून का प्रवर्तन उतने समय के लिए स्थगित हो जाएगा। उन्होंने आशंका जताई कि इस तरह की छूट का दुरुपयोग हो सकता है । लोग कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए जानबूझकर तुच्छ मुकदमे या एफआईआर दर्ज करा सकते हैं ताकि दो साल की सुरक्षा का लाभ उठाया जा सके। उन्होंने इसे “अवांछित न्यायिक सक्रियता” और विधायिका के अधिकार-क्षेत्र में हस्तक्षेप करार दिया। इसी तरह, ध्वस्तीकरण से पहले एक वर्ष की “नोटिस ऑफ इंटेंट” वाली शर्त को भी उन्होंने कानून में प्रावधान न होने के आधार पर अस्वीकार किया। हालांकि एक राय भी हुए
हालांकि, दोनों न्यायाधीश इस बात पर सहमत रहे कि यदि निर्माण उल्लंघन को लेकर नोटिस जारी किया जाता है, तो संबंधित दोषी अधिकारियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत समानांतर कार्रवाई भी शुरू की जानी चाहिए और उसे छह महीने के भीतर तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाया जाना चाहिए। दोनों ने यह भी माना कि विकास प्राधिकरण की कार्रवाई किसी एक व्यक्ति के विरुद्ध चुनिंदा नहीं होनी चाहिए, अन्यथा पीड़ित पक्ष अदालत का रुख कर सकता है। फैसले में न्यायमूर्ति नंदन ने सुपरटेक बनाम एमराल्ड कोर्ट और एशा एकता अपार्टमेंट्स जैसे सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि अवैध निर्माणों के लिए अकेले उल्लंघनकर्ता ही नहीं, बल्कि निर्माण को मंजूरी देने वाले विकास प्राधिकरण के अधिकारी भी उतने ही जिम्मेदार हैं, और दोनों के बीच अक्सर मिलीभगत पाई जाती है। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ आम नागरिक के अवैध निर्माण को गिराना पर्याप्त नहीं, बल्कि लापरवाह अधिकारियों पर भी कार्रवाई जरूरी है। चूंकि दोनों न्यायाधीशों के बीच दो अहम कानूनी सवालों पर मतभिन्नता (1) क्या अनुच्छेद 226 के तहत दो साल की सामान्य रोक लगाई जा सकती है, और (2) क्या नगरीय कानून के तहत कार्रवाई से एक साल पहले “नोटिस ऑफ इंटेंट” देना अनिवार्य किया जा सकता है, यह मामला अब मुख्य न्यायाधीश के पास भेजा जाएगा, जो इसे किसी तीसरे न्यायाधीश या पीठ को सौंपेंगे। तब तक याचिकाकर्ताओं की आवासीय संपत्ति को लेकर राज्य सरकार ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल कोई कार्रवाई प्रस्तावित नहीं है, जबकि आरा मिल के विरुद्ध वन अधिनियम के तहत कार्रवाई यथावत जारी रहेगी। “इंडियन लॉज,” जो आपराधिक मामले में घटनास्थल है, केस प्रॉपर्टी के रूप में बी एन एस एस के प्रावधानों के तहत निपटाई जाएगी।
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बुलडोजर कार्रवाई, पाक्सो मामले में दो जजों की अलग राय:हाईकोर्ट के जजों में फैसले के लेकर एकराय नहीं, केस तीसरे जज को रेफर